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टाइगरों की लड़ाई देखने का शौक

Monday, September 10, 2018 08:40 AM

फाइल फोटो

जयपुर में टाइगरों की वह लड़ाई बहुत से लोगों को याद होगी जिसमें जयपुर के शिकार महकमे के इंचार्ज कर्नल केसरी सिंह के पालतू टाइगर हैप्पी ने मादा टाइगर और अपनी बहन ग्रम्पी की जान ले ली थी। यह लड़ाई गुजरात की नवा नगर रियासत के महाराजा जाम साहब के मनोरंजन के लिए कराई गई थी, जो महाराजा मानसिंह के मेहमान बनकर कुछ दिन यहां आए थे। जानवरों की लड़ाइयां देखने का जयपुर के महाराजा को भी शौक था।

साल में एक बार चौगान स्टेडियम में हाथियों की लड़ाइयों का आयोजन होता था और दूसरे जानवरों की लड़ाइयों के लिए भी कर्नल साहब ने एक अहाता भी बनवा रखा था। इसमें कई अवसरों पर बाघों और बघेरों को छोड़ा गया लेकिन आदमियों के सामने लड़ने को वे तैयार नहीं हुए। आखिर आदमी दोनों ही के तो दुश्मन हैं और उनके मन बहलाव के लिए वे कैसे लड़ सकते हैं।

वे अपना हिसाब-किताब तो रात को ही तय करते जब कोई उन्हें देखने वाला नहीं होता। नवा नगर के जाम साहब ने जब टाइगरों की लड़ाई देखने की फरमाइश की तो महाराजा मानसिंह ने आगाह किया कि यह पूरी तरह से फ्लॉप शो होगी। उनका यह कहना सही था क्योंकि दो टाइगर दर्शकों की खुशी और मनोरंजन के लिए कभी अपना खून नहीं बहाते। रामनिवास बाग की जन्तुशाला और चिड़ियाघर तब कर्नल केसरी सिंह की ही देखरेख में थे।

और वहां जाकर जानवरों की आदतों का अध्ययन करना उनका शौक और व्यसन था। वे जानते थे कि हैप्पी को अपनी बहन ग्रम्पी से करीब करीब नफरत ही हो आई थी और अगर इन दोनों को रामनिवास बाग की जन्तुशाला के एक बाड़े में छोड़ा जाए तो ये ऐसे भिड़ेंगे कि क्या कहिए। जाम साहब के कहने पर उन्होंने इन दोनों को ही लड़ाने का फैसला किया। यह वो समय था जब हिन्दुस्तान आजाद नहीं हुआ था और रियासतों के राजा-महाराजाओं का एक शौक बाघ-बघेरों की लड़ाई देखने का भी था।

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