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अमृत का स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए थे भगवान धन्वंतरि

Monday, November 05, 2018 15:40 PM

जयपुर। धन्वंतरि आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देवता हैं समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत का स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। इस दौरान कई प्रकार की औषधियां उत्पन्न हुईं और उसके बाद अमृत निकला। धन्वंतरि वैद्य को आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने विश्वभर की वनस्पतियों पर अध्ययन कर उसके अच्छे और बुरे प्रभाव-गुण को प्रकट किया। धन्वंतरि के हजारों ग्रंथों में से अब केवल धन्वंतरि संहिता ही पाई जाती है, जो आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है।

दीपावली के दो दिन पूर्व हम धनतेरस पर्व को किसी न किसी रूप में मनाते हैं। यह महापर्व कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है तथा उनसे यह प्रार्थना की जाती है कि वे समस्त विश्व को निरोग कर समग्र मानव समाज को रोग विहीन कर उन्हें दीर्घायुष्य प्रदान करें। पौराणिक मान्यता है कि धनवंतरि भगवान विष्णु के अंश हैं,जिनकी चार भुजाएं हैं,ऊपर की दोनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किए हुए हैं। जबकि दो अन्य भुजाओं में से एक में जलुका और औषध तथा दूसरे में अमृत कलश लिए हुए हैं। माना जाता है कि यह अमृत निर्माण की प्रक्रिया में दक्ष थे।

आयुर्वेद के प्रणेता
समुद्र मन्थन से उत्पन्न धन्वंतरि भगवान को आयुर्वेद जगत के प्रणेता तथा चिकित्सा शास्त्र का देवता माना जात ा हैं। इनकी चौबीस अवतारों के अंतर्गत गणना होने के कारण इन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता हैं।  आयुर्वेद की उत्पत्ति ब्रह्मा से ही मानते हैं और आदि काल के ग्रंथों में रामायण-महाभारत तथा विविध पुराणों की रचना हुई है जिसमें सभी ग्रंथों ने आयुर्वेदावतरण के प्रसंग में भगवान धन्वंतरि का उल्लेख किया है। महाभारत, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, श्रीमद भागवत महापुराणादि में उल्लेख मिलता है।

विष्णु पुराण के अनुसार
धन्वंतरि दीर्घतथा के पुत्र बताए गए हैं। इसमें बताया गया है वह धन्वंतरि जरा विकारों से रहित देह और इंद्रियों वाला तथा सभी जन्मों में सर्वशास्त्र ज्ञाता है। भगवान नारायण ने उन्हें पूर्व जन्म में यह वरदान दिया था कि काशिराज के वंश में उत्पन्न होकर आयुर्वेद के आठ भाग करोगे और यज्ञ भाग के भोक्ता बनोगे। महाकवि व्यास द्वारा रचित श्रीमद भागवत पुराण के अनुसार धन्वंतरि को भगवान विष्णु के अंश माना है तथा अवतारों में अवतार कहा गया है। 

क्यों जलाते हैं यम का दीपक
देश के अधिकांश भागों में यम के नाम पर दीपदान की परंपरा है। दीपावली के दो दिन पूर्व त्रयोदशी के सायंकाल मिट्टी का कोरा दीपक लेते हैं। उसमें तिल का तेल डालकर नवीन रूई की बत्ती रखते हैं और फिर उसे प्रकाशित कर, दक्षिण की तरह मुंह करके मृत्यु के देवता यम को समर्पित करते हैं। तत्पश्चात इसे दरवाजे के बगल में अनाज की ढेरी पर रख देते हैं। प्रयास यह रहता है कि यह रातभर जलता रहे बुझे नहीं। धनतेरस को पूरे दिन का व्रत और यमुना में स्रान कर धन्वंतरि और यम का पूजन-दर्शन करने की परंपरा है। माना जाता है कि यह अकाल मृत्यु से बचाव कर सकता है। यदि यह संभव न हो तो भी संध्या के समय घर के प्रवेश द्वार पर यम के नाम का एक दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। इससे असामयिक मृत्यु और रोग से मुक्त जीवन प्राप्त किया जा सकता है।

किन बातों का ख्याल रखें
-सारी सफाई के कार्यक्रम धनतेरस के पूर्व निपटा लें, धनतेरस के दिन तक सफाई जारी न रखें। 
-इस दिन केवल कुबेर की पूजा न करें, धन्वन्तरी देवता की उपासना भी जरूर करें।
-अगर इस दिन धातुओं का क्रय करना है तो सोना, पीतल चांदी या स्टील खरीदना चाहिए।
-दीपावली के लिए गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां और अन्य पूजन सामग्री भी इसी दिन क्रय करें। 
 -धनतेरस के दिन लोहा खरीदने से बचना चाहिए।  इस दिन थोड़ा बहुत दान भी जरूर करें।

क्या खरीदें
-धातु का बर्तन, अगर पानी का बर्तन हो तो ज्यादा अच्छा होगा।
-गणेश लक्ष्मी की मूर्तियां दोनों अलग-अलग होनी चाहिए।
-खील बताशे और मिट्टी के दीपक, एक बड़ा दीपक भी जरूर खरीदें।
-चाहें तो अंकों का बना हुआ धन का कोई यन्त्र भी खरीदें।

 

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