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खाना खज़ाना

ये पांच पीढ़ियों से बेच रहे हैं पकौड़े-भुजिए, नेता और अभिनेता भी हैं शौकीन

Monday, February 12, 2018 11:15 AM

शहर में रविवार को मौसम ने पलटी खाई। आसमान पर बादलों ने घेरा डाला। तो ठंडी हवाएं भी बहने लगीं। मौसमी मिजाज बदलते ही, गरमागरम पकौड़ों की तलब होने लगी। कढ़ाई से उतरते गरमागरम पकौड़े। वैसे सर्द मौसम में पकौड़ों की याद दिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की राजनीति भी गरमा दी। वह भी पकौड़ों से बेरोजगारी दूर करने का मंत्र देकर। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सिद्ध किया कि भिक्षा मांगने से तो अच्छा है बेरोजगार युवा पकौड़े तले। उन्हें वर्तमान में पकौड़ी बनाने वालों की भावी पीढ़ी को उद्योगपति बनते देखने का सपना भी दिखाया। तब से देश भर की राजनीतिक  तेल में ‘पकौड़ा-पॉलिटिक्स’ तली जा रही है। कोई समर्थन कर रहा, तो कोई विरोध में उतर आया है। बेचारा पढ़ा-लिखा नौजवान अपनी किस्मत को कोस रहा है।

जगन्नाथजी और लालाजी पकोड़ी वाले
ऐसे माहौल में हम जा पहुंचे जयपुर के मशहूर त्रिपोलिया बाजार में। जहां जगन्नाथजी पकौड़ीवालों की दुकान है। आजकल यह दुकान पकौड़ों की वजह से जयपुर शहर की हैरिटेज में गिनी जाती है। आखिर पांच पीढ़ियों से यह परिवार पकौड़ा-व्यवसाय से जो फलता-फूलता आया है। इस दुकान में बनते पकौड़ों की महक और उसके जायके का जयपुरवासियों ने वर्षों से लुत्फ उठाया। महक ऐसी कि त्रिपोलिया बाजार से लेकर बड़ी चौपड़ के आसपास गुजरने वाले खुद-ब-खुद इसकी ओर खिंचते चले आएं। पकौड़े सिर्फ खाने तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि इनके दान से पुण्य भी बटोरा जाता है।

खाना ही नहीं, दान-पुण्य भी
एक जमाना वह था जब जयपुरवासी दुकान के बाहर ही कढ़ाई से उतरते पकौड़ों को दुकान के बाहर ही फुटपाथ पर खड़े होकर इनका जायका लिया करते। पुण्य कमाने वाले हवा में पकौड़े उछाल-उछालकर चील-कौवों को खिलाया करते थे। यह नजारा उस समय आम था जब जयपुर की चौड़ी सड़कों पर यातायात बहुत कम होता था। लेकिन समय के बदलने के साथ शहर की सड़कों पर यातायात का दबाव बढ़ा। आज स्थिति यह है कि इस बाजार से गुजरते राहगीरों को सड़क पार करना मुश्किल हो जाता है। लिहाजा चीलों को बड़े खिलाने वाले अब यहां से खरीदकर रामनिवास बाग चले जाते हैं, वहीं उन्हें खिला, पुण्य बटोरते हैं। भिखारियों को भी दान करते हैं।

कमाई इतनी की दाल-रोटी निकल रही
जगन्नाथ पकौड़ीवालों के वंशज महेश शर्मा और पास ही बृजनाथजी मंदिर के गौखे पर पकौड़ी की दुकान चलाने वाले हरिदासजी लालाजी के वंशज, दिनेश सैनी बताते हैं कि उनके कुनबे पकौड़े बनाकर अपना-अपना परिवार मजे से चला रहे हैं। थोड़े संभलते और झिझकते हुए बताते हैं कि हजार-दो हजार का गल्ला तो दिन भर उठ ही जाता है। फिर परिवार के साथ कामगारों को भी तो पारिश्रमिक देना पड़ता है। कुछ परिजन भले ही सरकारी नौकरियों में हों, लेकिन इन्हीं दुकानों से होने वाली आय से इनके कुनबे की मजे से गुजर-बसर हो रही है। पकौड़ों से होने वाली आय के बारे में पूछने पर उनका जवाब यही मिलता है-जी, महंगाई के जमाने में दाल-रोटी चल रही है। यह बात अलग है कि पहले कभी किराए के मकानों में रहते थे, लेकिन आजकल अपने पक्के मकान में रहते हैं। बातचीत में दोनों दुकानदारों ने बताया कि वह वक्त ओर था, जब पूरे शहर में हमारी दुकानें ही पकौड़ी-भुजिए के लिए प्रसिद्ध थीं। तब जयपुर के हलवाई सिर्फ मिठाइयां बनाते थे, लेकिन आज हर गली-मोहल्ले में पकौड़ों की दुकानें खुल गई हैं।

संतरी से मंत्री तक शौकीन
हमारे यहां सिर्फ आमजन ही नहीं, दरबार और दरबारी, आजादी के बाद कई नेता और अभिनेता हमारे पकौड़ों, भुजियों के दीवाने रहे हैं। आज भी आते हैं, कुछ यहां खाकर चले जाते हैं, तो कुछ घर पर बंधवा ले जाते हैं। जब हवामहल के पास पुरानी विधानसभा चलती थी, तो वहां भी हमारी बने दाल के पकौड़े और भुजिए जाया करते थे। राजशाही से लेकर आज तक चीलों को खिलाने वाले बड़ों की खरीद आज भी हमारी दुकानों से होती है। भाजपा के नेता स्वर्गीय रामदास अग्रवाल के यहां तो रोज दस रुपए के चीलों के बड़े जाते थे। आजादी से पहले पकौड़ियां और भुजिए एक आना सेर बिकते थे। आज एक सौ चालीस रुपए किलो के भाव से बेचे जा रहे हैं। 

गाडुले-लुहारों की ज्योंणरें
किसी जमाने में ग्राहकों की भीड़ यहां मचक के पड़ती थी। गाडुले-लुहारों की ज्यौंनारें, हनुमान के रास्ते के बने लड्डुओं और हमारे भुजियों के साथ बृजराज मंदिर में ही हुआ करती थीं। गांव के लोग सेर भुजिए और लड्डुओं के साथ अशोक पेड़ की छाया में बैठकर खाया करते थे। खा-पीकर यहीं ठंडी प्याऊ से पानी पी लिया करते थे।

नेता और अभिनेता तक
राजनीतिज्ञों में भैरोंसिंह शेखावत, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, गिरधारी लाल भार्गव, उजला अरोड़ा, कालीचरण सराफ, रघुशर्मा, बीनाकाक, सुरेश चौधरी, रामदास अग्रवाल खास शौकीन थे। अभिनेताओं में अमजद खान और राजा हासन जब भी जयपुर आते इनका लुत्फ उठाते। अब तो क्या चीलों को पकौड़े खिलाने वाले तो आज भी इसी दुकान से पकौड़े खरीदकर रामनिवास बाग में जाकर दान-पुण्य कमाते आ रहे हैं।

पूरे दक्षिण एशिया में लोकप्रिय
दिल्ली के स्ट्रीट फूड में शामिल तरह-तरह की सब्जियों या पनीर के पकौड़े हों, दक्षिण भारत में सड़क किनारे मिलने वाली भजिया हो, बिहार का मुंह में पानी लाने वाला तरुआ या बचका, पश्चिम बंगाल का आलू चॉप, प्याज से बनने वाली पियाजी, केवल बेसन से बनी फुलौरी हो या मछली के पकौड़े, जोधपुरी मिर्ची बड़ा हो, महाराष्ट्र में मिलने वाली भाजी या सीफूड के पकौड़े हों अथवा गोवा में बनाए जाने वाले काजू के पकौड़े, सभी बड़े पैमाने पर पसंद किए जाते हैं। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नाम से जाना जाने वाला पकौड़ा मूल रूप से देसी व्यंजन है। पूरे भारतीय उप महाद्वीप के देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल में खासा पसंद किया जाता है। पकौड़ा अफगानी भोजन का भी अभिन्न हिस्सा है।

यूरोपीय देशों में भी धाक
दक्षिण एशिया के अलावा यह ब्रिटेन में भी खासा मशहूर है। विशेष रूप से स्कॉटलैंड में। इटली में यह ‘फ्रितो मिस्तो’के नाम से जाना जाता है जिसमें सब्जियों, मांस और सीफूड को विशेष प्रकार के घोल में लपेटकर आॅलिव आयल में तला जाता है। अमेरिका और यूरोप में यह ‘फ्रिटर्स’ के नाम से मशहूर है। यहां मक्के के दानों और सब्जियों को छोटे टुकड़ों में काट कर घोल में लपेट कर तला जाता है। चीन में भी इसके चलन का जिक्र मिलता है। इसके अलावा जापान में पारदर्शी चावल के आटे में लिपटा नाजुक सा नजर आने वाला ‘टेंपुरा’ भी पकौड़े का ही एक अवतार है जो मांसाहारी तथा शाकाहारी दोनों ही प्रकार का होता है। 

- महेश शर्मा

 

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