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तेलंगाना में भाजपा को क्या हासिल होगा?

Monday, December 03, 2018 09:25 AM

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (फाइल फोटो)

जिन तीन राज्यों की विधानसभाओं के लिए मतदान हो चुके, उनमें से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में भाजपा को अपनी सरकार बरकरार रखनी है और मिजोरम में अपनी उपस्थिति दर्ज करनी है। जिन दो राज्यों में सात दिसंबर को वोट डाले जाएंगे, उनमें से राजस्थान में भाजपा को अपनी सत्ता कायम रखनी है और तेलंगाना में अपनी हैसियत दिखानी है। मिजोरम उत्तर पूर्वी भारत का कदाचित एकमात्रा राज्य है, जहां की राजनीति चर्च संचालित है।

कांग्रेस को भी क्षेत्राीय पार्टियों से तालमेल करके मिजोरम में जीत हासिल होती रही है। इन दलों के नेता इसाई हैं और उनका चुनाव एजेंडा चर्चों के पादरी तय करते हैं। इसलिए भाजपा का मिजोरम में पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह दावे में कितना दम है, यह भाजपा नेताओं के लिए भी कोई ज्यादा चिंता का विषय नहीं है।

लेकिन दक्षिण भारत का तेलंगाना भाजपा के लिए चुनौती है। क्योंकि नवगठित राज्य तेलंगाना का राजनीतिक समीकरण दक्षिण भारत के अन्य राज्यों से अलग है। दक्षिण भारत में भाजपा को ज्यों भी अपनी स्वीकार्यता साबित करने में अभी तक कोई खास सफलता नहीं मिली है। तेलंगाना विधानसभा का यह दूसरा चुनाव है, जो कार्यकाल समाप्त होने से आठ महीने पहले हो रहा है। तेलंगाना राष्ट्र समिति प्रमुख और राज्य के मुख्यमंत्राी के. चन्द्रशेखर राव ही तेलंगाना राज्य आंदोलन के हीरो हैं। तेलंगाना राष्ट्र समिति, टीआरएस के बैनर तले चन्द्रशेखर राव ने आंदोलन चलाया और 2014 में लोकसभा चुनाव से पहले तेलंगाना राज्य गठन का श्रेय लिया।

उसका चुनावी लाभ चन्द्रशेखर राव को मिला और वे सबसे ज्यादा लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे। आंध प्रदेश से अलग करके गठित तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य चन्द्रशेखर राव को मिला। अपनी लोकप्रियता के आत्मविश्वास से चन्द्रशेखर राव इतने लबरेज हुए कि सितंबर, 2018 में ही तेलंगाना विधानसभा भंग करके चुनाव आयोग से चुनाव कराने की मांग कर डाली। रिपोर्ट आयी थी कि विधानसभा भंग करने की सिफारिश राज्यपाल ई एस एल नरसिम्हा को भेजने से पहले मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे।

चन्द्रशेखर राव, केसीआर ने एक ही साथ प्रधानमंत्री, चुनाव आयोग समेत तेलंगाना में निर्णायक पारी खेलने वाली प्रमुख पार्टियां - कांग्रेस और तेलुगू देसम पार्टी दोनों को सकते में डाल दिया। एक साथ चुनाव कराने की बार-बार वकालत कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उसका सर्वसम्मत रास्ता खोज रहे चुनाव आयोग दोनों ही इस स्थिति का सामना करने को तैयार नहीं थे। आखिरकार काफी संवैधानिक जद्दोजहद के बाद चुनाव आयोग को उन्हीं चार राज्यों-राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम के साथ तेलंगाना का भी चुनाव कराने का फैसला करना पड़ा।

चुनाव आयोग के मुताबिक कोई भी विधानसभा भंग करके छह महीने तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने नहीं रह सकता। चुनाव अधिसूचना जारी हो गई और चुनाव आयोग ने कार्यकाल समाप्त होने वाली अंतिम विधानसभा राजस्थान के साथ जोड़कर सात दिसंबर को तेलंगाना के लिए भी मतदान कराने का एलान कर दिया। इस पूरी प्रक्रिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहीं पिक्चर में नहीं आए । टीआरएस प्रमुख केसीआर ने प्रधानमंत्री की ‘सहमति’ से यह अप्रत्याशित कदम उठाया या नहीं, इसका कोई पुख्ता प्रमाण सामने नहीं आया। प्रधानमंत्री अभी तेलंगाना को अन्य चार राज्यों के साथ जोड़ने के पक्ष में थे या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं हुआ। प्रधानमंत्री लोकसभा के साथ विधानसभाओं का चुनाव कराने पर बार-बार जोर दे रहे हैं और तेलंगाना विधानसभा का कार्यकाल लोकसभा के आसपास ही समाप्त होने वाला था।

लेकिन प्रधानमंत्री समेत भाजपा के वरिष्ठ नेता अभी तेलंगाना विधानसभा चुनाव का सामना करने को तैयार नहीं थे। यह बात 27 नवंबर को ही आधी स्पष्ट हो गई, जब प्रधानमंत्री ने हैदराबाद में अपनी पहली चुनावी रैली को संबोध्ति किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलुगू देसम पार्टी, टीडीपी का नाम नहीं लिया। टीडीपी प्रमुख और आंध्प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू के अचानक साथ छोड़ देने का सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को तेलंगाना में उठाना पड़ सकता है। चन्द्रबाबू नायडू भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ से दरअसल आंधप्रदेश को विशेष दर्जा/पैकेज देने के मुद्दे को लेकर अलग हुए।

लेकिन तेलंगाना विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ मिलकर ‘महाकुटमी’ गठजोड़ में शामिल होने से भाजपा के लिए रणनीति तैयार करना कठिन हो गया। प्रधानमंत्री के भाषण से लगा कि वे चन्द्रबाबू नायडू से बिगाड़ मोल लेने को तैयार नहीं है। अवसरवादी गठजोड़ और परिवारवाद की राजनीति के खिलाफ बोलने के क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीआरएस और कांग्रेस दोनों पर हमला बोला लेकिन नरेंद्र मोदी के निशाने पर वास्तव में कांग्रेस है। नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में तेलंगाना के मतदाताओं से कांग्रेस को एक भी वोट न देने की अपील की, लेकिन टीआरएस के लिए ऐसा नहीं कहा। तेलंगाना की जमीनी सच ये है कि भाजपा के पास अपना वोट नहीं है।

भाजपा को हमेशा से टीडीपी के साथ गठजोड़ का वोट मिलता रहा है। तेलंगाना राज्य आंदोलन के विरोध में भाजपा की भूमिका टीडीपी के समर्थन की रही है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में या विपक्षी नेता के रूप में चन्द्रबाबू नायडू तेलंगाना गठन के विरोधी रहे। कांग्रेस भी उतनी ही विरोधी रही। लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने हवा का रूख देखकर रंगत बदला। 2009 के लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव दोनों में कांग्रेस ने तेलंगाना राज्य गठन के वायदे पर अच्छी-खासी सीटें जीती। 2014 लोकसभा चुनाव करीब आते-आते टीआरएस नेता केसीआर ने आंदोलन इतना तेज कर दिया। 

कि कांग्रेस आलाकमान को अपनी आंध्र प्रदेश यूनिट के नेताओं के विरोध के बावजूद तेलंगाना राज्य बनाने के लिए आंध्र प्रदेश पूनर्गठन बिल संसद से पारित करना पड़ा। इसके विरोध में आंध्र प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने बिल पारित होते ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। चन्द्रबाबू नायडू लगातार चुप्पी साधे रहे। भाजपा का योगदान सिर्फ  इतना रहा कि बिना चर्चा के संसद से तेलंगाना राज्य गठन बिल पारित कराने में कांग्रेस का भाजपा ने साथ दिया। 

-शशिधर खान







 

 

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