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अब की बार किसकी सरकार?

Thursday, December 06, 2018 09:00 AM

लोकतंत्र की महाभारत का 19वां पर्व, हमारा ये चुनाव पर्व है जिसमें जनता सारे काम भूलकर बस एक सवाल पर महीनों तक उलझी रहती है कि अब की बार-किसकी सरकार? इस छोटे से निर्णय को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते हमारी कई पीढ़ियां बीत गई हैं और 1952 से लेकर अब तक के सभी चुनाव देखकर भी ये हालत है कि जनता जो चााहती है वैसा कोई परिणाम सामने नहीं आ रहा है। लोकतंत्र में इतना बदलाव जरूर आज दिखाई दे रहा है कि मतदान का प्रतिशत लगातार बढ़ रहा है तो युद्ध जीतने के सारे हथकंडे भी आज जनता पर आजमाए जा रहे हैं।

अभी हाल में मुख्य चुनाव आयुक्त खुद कह रहे थे कि 2018 के चुनावों पर कालाधन, झूंठी खबरें और टेक्नोलॉजी के भ्रामक प्रयोग भारी पड़ रहे हैं और राजनैतिक दलों की बढ़ती संख्या ने जनता के मन की बात को एक खण्ड-खण्ड पाखण्ड पर्व में बदल दिया है। इन दिनों राजस्थान की 15वीं विधानसभा का चुनावी तूफान देखकर भी लगता है कि धुंआधार प्रचार में जाति, धर्म के गढ़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं तो सामंतों की बिरदावलियां गाई जा रही हैं तो हिन्दुत्व की तलवारें चमकाई जा रही हैं तो गली-मोहल्लों तक से फूट डालो राज करो की सनातन आवाजें आ रही हैं तो छल-बल की सभी रीति-नीतियां अपनाई जा रही हैं।

इसके विपरीत अब विकास की बात कोई नहीं कर रहा है और रोटी, कपड़ा, मकान जैसे बुनियादी सवाल कौड़ियों के मोल संचालित हो रहे प्रचार के हाहाकार में लापता हो गए हैं। हमारी राय में ये सब कुछ देश के उन किसानों, बेरोजगारों तथा दलित, आदिवासी और महिलाओं के साथ धोखा है जो सदियों से पीड़ित, शोषित और वंचित हैं। एक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक गैर बराबरी से सताए हुए इस देश में सत्ता और व्यवस्था का ऐसा संगठित झूंठ यहां केवल चुनाव प्रचार में ही देखा जा सकता है। सपनों का बेचने और भुनाने से अब चुनाव का ये खेल इतना घातक हो गया है कि हजारों साल से लड़ते-मरते इस देश का नागरिक खुद एक अजूबा बन गया है और रात दिन अपने घर-परिवार को बचाने की जुगत में मुफ्त की हर सौगात और अच्छे दिनों की हर घोषणा के पीछे दौड़ रहा है।

लोकतंत्र में चुनाव का होना अब इसीलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि सरकार बदलने के अलावा अब मतदाता के पास कोई दूसरी ताकत और विकल्प नहीं है। क्योंकि चुनावों से भविष्य नहीं बदलता, इसलिए सरकार बदलने से गरीब को ये संतोष जरूर होता है कि चलो इस सरकार से तो पीछा छूटा। मतदाता से चतुर राजनेता भी इसीलिए डरता है कि वोट की ताकत अच्छों-अच्छों की जमानत जप्त करवा देती है और सरकार भी आसमान से जमीन पर आ जाती है। परिवर्तन का ये वरदान हम  भारत के लोगों को स्वतंत्रता संग्र्राम के संघर्ष और आजादी के सागर मंथन से मिला है। शक, हूण, मुगल और अंग्र्रेजों की गुलामी से मुक्ति का ये संग्र्राम गरीबों और वंचितों ने ही लड़ा है

तथा हिन्दुत्व और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने नहीं लड़ा है। इसलिए लोकतंत्र में संविधान और आजादी का ये चुनावी तोहफा भी आज हमारी विरासत और शक्ति है। लेकिन आज भी राजनीति के खिलाड़ियों को ये गलत फहमी है कि वो धन बल, प्रचार बल, बाहुबल और जाति-सम्प्रदायों के छलकपट से लोकतंत्र को बंधक बना सकते हैं। इसीलिए पिछले 70 साल का चुनावी अनुभव हमें यह याद दिलाता है कि सत्ता और व्यवस्था को बदलते रहना ही आगे के अच्छे दिनों की गारंटी है। स्थापित को विस्थापित करना और विस्थापित को स्थापित करना ही इस लोकतंत्र की कामयाबी है क्योंकि एक परिवर्तन से ही फिर दूसरे परिवर्तन का जन्म होता है और एक राजा हारने पर ही प्रजा को नया राजा मिलता है। ये एक अंकुश ही सत्ता के पागल हाथी को नियंत्रित करता है। ऐसे में सबकी सुनिए और मन की करिए।

चुनाव में मतदान का बढ़ना भी लोकतंत्र के प्रति जनता की बढ़ती आस्था का उत्साह है। नेता और राजनीति यदि हमें भेड़ बकरी समझने की गलती करेगी तो ये उसकी भूल होगी क्योंकि हिंसा का इलाज अहिंसा से और पाप का इलाज पुण्य से और अहंकार का इलाज विनम्रता से और झूंठ का इलाज सत्य के प्रयोग से ही होता है। क्योंकि समय, समाज और देश का भविष्य मंदिरों की आरती और मस्जिदों की अजान से नहीं बदलता अपितु किसानों-मजदूरों की मेहनत और युवाओं के संघर्ष तथा महिलाओं के जागरण से ही बदलता है। अत: अपने मत का सोच-समझ कर प्रयोग करें।

- वेदव्यास

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