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ओपिनियन

रूस हमारा जांचा परखा मित्र है

Friday, October 12, 2018 09:35 AM

अभी-अभी संपन्न हुए रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन की भारत यात्रा कई मायनों में अत्यन्त ही महत्वपूर्ण रही। भारत ने रूस के साथ लगभग 40 हजार करोड़ की लागत एस-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने का सौदा किया। यह अपने आप में अत्यन्त ही महत्वपूर्ण बात है। हाल तक अमेरिका भारत सहित अन्य देशों को डरा धमका रहा था कि जो देश रूस के साथ रक्षा समझौता करेंगे या रूस के रक्षा विमानों और मिसाइलों को खरीदेंगे उनके साथ अमेरिका मित्रवत् संबंध नहीं रखेगा। इस बीच रूस चीन के बहुत नजदीक आ गया था और भारत को यह डर सताने लगा था कि शायद रूस भारत के साथ कोई रक्षा समझौता नहीं करे। परन्तु भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कूट नीति पूर्णत: सफल रही।

उन्होंने अमेरिका को अपने पक्ष में तो कर ही लिया था। परन्तु साथ ही साथ यह जगजाहिर कर दिया कि सुरक्षा के मामले में भारत किसी बात पर समझौता नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिका की चेतावनी को दर किनार किया और रूस के साथ एस-400 मिसाइल का सौदा कर लिया। अन्य क्षेत्रों में भी रूस ने भारत के साथ पुरानी दोस्ती निभाने का वायदा किया है। नई पीढ़ी के लोगों को संभवत: यह ज्ञात नहीं होगा कि भारत के कठिन दिनों में रूस जो उस समय ‘सोवियत रूस’ कहलाता था किस तरह आगे बढ़कर उसने भारत का साथ दिया था। हमारी गलती से या सच कहा जाए लार्ड माउंटबेटन के बहकावे में आकर भारत कश्मीर के मामले को सुरक्षा परिषद में ले गया था

जिसमें ब्रिटेन और पश्चिम के देश शामिल थे। अमेरिकी ने कसकर भारत का विरोध किया था। पंडित नेहरू हैरान और परेशान हो गए थे। सुरक्षा परिषद ने यह प्रस्ताव पास कर दिया था कि कश्मीर में जनमत संग्रह होना चाहिए। पंडित नेहरू को इस बात की जरा भी आशंका नहीं थी और उस समय लगता था कि पश्चिमी देशों के षडयंत्र के कारण भारत घिर गया है और संभवत: कश्मीर हमारे हाथ से निकल जाएगा। ऐसे बुरे वक्त में रूस ने आगे बढ़कर हमारा साथ दिया और सुरक्षा परिषद में वीटो लगाकर अमेरिकी और ब्रिटिश प्रस्ताव की धार कमजोर कर दी।

द्वितीय विश्व युद्व के बाद संसार में ‘शीतयुद्व’ आरम्भ हो गया और संसार दो धड़ों में बंट गया। एक धड़े का मुखिया अमेरिका हो गया और दूसरे का सोवियत रूस। अमेरिका ने तो उस समय जमकर भारत विरोध किया और बड़ी बेशर्मी से उसने पाकिस्तान का साथ दिया। पाकिस्तान को भरपूर पैसे से मदद की और आधुनिकतम अस्त्र-शस्त्र और लड़ाकू विमान दिए। भारत के विरोध पर अमेरिका ने कहा कि यह सब कुछ चीन के खिलाफ  पाकिस्तान इस्तेमाल करेगा। परन्तु बाद की घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि सारी अमेरिका मदद का इस्तेमाल पाकिस्तान ने भारत के विरूद्व किया। ऐसे में यदि तत्कालीन रूस जो उस समय सोवियत रूस कहलाता था, भारत का साथ नहीं देता तो हम हर तरह से लाचार होकर दीन-हीन बन जाते।

भारत ने यद्यपि ‘गुटनिरपेक्ष’ की विदेश नीति अपनाई थी। परन्तु यह सच है कि हमारा झुकाव पूर्णत: रूस की तरफ  था। रूस की मदद से भारत में स्टील के आधुनिकतम कारखाने लगे और दूसरे इंजीनियरिंग सामान बनाने के कारखाने भी लगने लगे। सोवियत रूस द्वारा स्थापित किए गए स्टील के कारखाने या रक्षा उपकरणों के कारखाने आज तक चुस्त दुरूस्त चल रहे हैं। रूस ने बिना किसी हिचक के हजारों भारतीय टैक्नीशियनों को अपने यहां प्रशिक्षित किया जिन्होंने भारत के आधुनिकतम कारखानों को बिना किसी रूकावट के सुचारू रूप से चलाया।

जब कुछ वर्ष पहले सोवियत रूस का विघटन हो गया और उसके कब्जे में पूर्वी यूरोप के जो देश थे वे धीरे-धीरे स्वतंत्र हो गए उस समय ऐसा लग रहा था कि रूस अब हमारी मदद करने योग्य नहीं रह गया है। परन्तु यह अनुमान गलत निकला और रूस ने अपनी आर्थिक मजबूरी के बाद भी भारत का खुले हृदय से साथ दिया। पुतिन ने भारत के हाल के दौरे में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आश्वस्त किया कि वह  पूरी तरह भारत के हितों की रक्षा करेंगे और भारत के साथ जो पुराने संबंध हैं वे कायम रहेंगे। उनके कहने का अर्थ था कि यह सच है कि रूस और चीन में हाल के वर्षों में दोस्ती बहुत अधिक बढ़ गई है। परन्तु इससे भारत के साथ रूस की दोस्ती में कोई अन्तर नहीं आएगा बल्कि रूस चीन पर यह दबाव डाल सकता है

कि वह पाकिस्तान की आतंकवादी हरकतों को बंद करवाए। पुतिन ने साफ -साफ कहा कि भारत की तरह रूस भी आतंकवादी हरकतों को बरदास्त नहीं कर सकता है और इस दिशा में वह पूरी तरह भारत के साथ है। अमेरिका ने अभी तक भारत और रूस के बीच संपन्न हुए एस-400 मिसाइल के सौदे पर अपनी कोई टिप्पणी नहीं की है। परन्तु भारत ने सही अर्थ में अमेरिका को आश्वस्त कर दिया है कि रूस के साथ उसके पुराने संबंध हैं और वह किसी भी हालत में उन संबंधों को कम नहीं करेगा।
यह सही है कि हाल के वर्षों में भारत अमेरिका के बहुत नजदीक आ गया है

और कई मामलों में भारत के दृष्टिकोण को सही आंकते हुए पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य मदद बन्द कर दी है। इसलिए हमें अमेरिका की मित्रता की भी आवश्यकता है और रूस की दोस्ती की भी। आशा की जानी चाहिए कि अमेरिका इस सत्य को समझेगा और भारत की सुरक्षा की दृष्टि ने भारत ने रूस के साथ जो एस-400 मिसाइलों का समझौता किया है उसमें कोई टांग नहीं अड़ाएगा। कुल मिलाकर यह तो मानना ही होगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कूटनीति पूर्णत: सफल रही है।             
-डॉ. गौरीशंकर राजहंस
 

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