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बेमानी है बांधों के प्रबंधन में बदलाव

Wednesday, September 12, 2018 08:45 AM

बीते दिनों केरल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद माना जा रहा है कि इस बाढ़ का प्रमुख कारण मानसूनी बारिश के साथ इडुकी बांध का कुप्रबंधन था जहां से अचानक लाखों क्यूसेक पानी छोड़ा जाना ही बर्बादी का सबसे बड़ा कारण बना। इसलिए भविष्य में ऐसी घटनाएं ना हों, इसलिए बांध प्रबंधन प्रोटोकाल में तत्काल बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। ऐसा अभी केरल में घटित हुआ, ऐसा भी नहीं है, इससे पहले 2006 में गुजरात में उकाई बांध से, 2014 में तमिलनाडु में अडयार नदी पर बने चेमबरबक्कम बांध से और 2016 में मध्यप्रदेश में बाणसागर बांध से पानी छोड़ने के कारण 2006 में सूरत का 80 फीसदी हिस्सा डूब गया, 2014 में चेन्नई में चेमबरबक्कम बांध से चेन्नई को दशकों बाद प्रलंयकारी बाढ़ का सामना करना पड़ा और 2016 में बाणसागर बांध के कारण बिहार को बाढ़ से तबाही झेलने को विवश होना पड़ा।

विडम्बना यह है कि बांधों के निर्माण से लेकर आज तक उसके लाभ, हानि और बाढ़ नियंत्रण संबंधी पहलुओं का कभी भी अध्ययन किए जाने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया। फिर हमारे यहां देश में बहुतेरे बांधों का नियंत्रण अंतरराज्यीय है। अब हमारी सरकार बांधों के प्रबंधन, सुरक्षा मानकीकरण में एकरूपता लाने, राष्ट्रीय बांध सुरक्षा समिति और बांध सुरक्षा प्राधिकरण के गठन की खातिर एक विधेयक संसद में लाने पर विचार कर रही है। जहां तक केरल की बात है यहां के अधिकतर बांध पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील पश्चिमी घाट पर बने हैं। जबकि अधिकतर भूस्खलन की होती घटनाओं से जन धन की हानि यहीं हुई है।

गौरतलब बात यह है कि बांधों का निर्माण अधिकतर बिजली उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण के उददेश्य से किया गया था। सच तो यह है कि असलियत में आजादी के बाद से आज तक इस उद्देश्य में भी हमें कामयाबी नहीं मिली। लेकिन फिर भी देश में बांधों का जाल बिछाया जाना जारी है। समझ नहीं आता कि बांधों से हो रहे पर्यावरण विनाश को लेकर बरसों से पर्यावरणविद चेता रहे हैं लेकिन हमारी सरकार उनकी बातों को बराबर अनसुना करती रही है और बांधों को विकास का प्रतीक बताने का ढिंढोरा पीट रही है जबकि असलियत इसके उलट है। कैग की रिपोर्ट ने कई साल पहले यह साबित भी कर दिया है। इस सबके बावजूद हमारी सरकार पूर्वोत्तर में बड़े बांधों को बनाकर पूर्वोत्तर को विकास का नमूना दिखाना चाह रही है। पूर्वोत्तर में कुल 250 से अधिक बांध बनने की प्रक्रिया जारी है।

इन बांधों से समूची ब्रह्मपुत्र नदी पर आने वाले भीषण संकट को नकारा नहीं जा सकता। उस हालत में जबकि यह समूचा क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र पांच में आता है और यहां भू-स्खलन हमेशा होता ही रहता है। सच यह है कि बांधों ने पर्यावरणीय शोषण की प्रक्रिया को गति देने का काम किया है जबकि बांध समर्थक इसके पक्ष में सिंचाई, जल, विद्युत आदि सुविधाओं, रोजगार और मत्स्यपालन आदि कार्यों में बढ़ोतरी का तर्क देते हैं। विश्व बांध आयोग के सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि बांध राजनेताओं, प्रमुख केन्द्रीयकृत सरकारी-अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाआें और बांध निर्माता उद्योग के अपने निजी हितों की भेंट चढ़ जाते हैं। हमारी सरकार है कि वह दूसरे देशों से सबक लेने को तैयार नहीं है जो अपने यहां बांधों को खत्म करते जा रहे हैं। गौरतलब है कि आज भारत समेत दुनिया के बड़े बांधों को ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। ब्राजील के वैज्ञानिकों के शोध इस तथ्य का खुलासा कर इसकी पुष्टि कर रहे हैं।

उनसे स्पष्ट हो गया है कि दुनिया के बड़े बांध 11.5 करोड़ टन मीथेन वायुमंडल में छोड़ रहे हैं। भारत के बांध कुल ग्लोबल वार्मिंग के पांचवें हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। वे सालाना तीन करोड़ 35 लाख टन मीथेन वायुमंडल में छोड़ रहे हैं। इससे स्थिति की भयावहता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि दुनिया के कुल 52 हजार के लगभग बांध और जलाशय मिलकर ग्लोबल वार्मिंग पर मानव की करतूतों के चलते पड़ने वाले प्रभाव में चार फीसदी का योगदान कर रहे हैं। इस तरह इंसानी करतूतों से पैदा होने वाली मीथेन में बड़े बांधों की अहम् भूमिका हैै। भारत में बड़े बांधों से कुल मीथेन का उत्सर्जन 3.35 करोड़ टन है जिसमें जलाशयों से 11 लाख टन, स्पिलवे से 1.32 करोड़ टन और पनबिजली परियोजनाओं के टरबाइनों से 1.92 करोड़ टन मीथेन का उत्सर्जन होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत के जलाशयों से कुल मीथेन का 4.58 करोड़ टन उत्सर्जन हो सकता है।

ब्राजील के नेशनल इंस्टीटयूट फॉर स्पेस रिसर्च के वैज्ञानिकों इवान लीमा एवं उनके सहयोगियों द्वारा किया गया शोध यह मिथक तोड़ता है कि बड़ी पनबिजली परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली साफ होती है और वह पर्यावरण पर दुष्प्रभाव नहीं डालती है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि बिजली बनाने में बांध में पानी जमा करके उससे टरबाइनों को चलाना सभी दृष्टि से सबसे सुरक्षित होता है। असल में बांधों के निर्माण से लोगों के विस्थापन और कुछ पर्यावरणीय अड़चनों के अलावा अभी तक बांधों के सामने कोई बड़ी समस्या आड़े नहीं आई है। लेकिन बदली स्थिति में वैज्ञानिकों के अनुसार बांधों में जमा होने वाली गाद के साथ-साथ अधिकाधिक मात्रा में आर्गेनिक मैटीरियल भी जमा होते हैं जिनका विघटन मीथेन पैदा करता हैै।

बांधों की आयु के अनुसार मीथेन की मात्रा भी स्वाभाविकत: बढ़ती जाती है। आंकड़ों के अनुसार चीन द्वारा सालाना 44 लाख टन बड़े बांधों से मीथेन छोड़ी जाती है जबकि भारत के बांध उससे 7.5 गुणा से ज्यादा मीथेन छोड़ रहे हैं। तात्पर्य यह है कि 42.5 करोड़ टन कार्बन हाई आॅक्साइड के बराबर भारत के बांध मीथेन का उत्सर्जन करते हैं।  कारण यह है कि भारत उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में आता है और तापमान की वृद्धि मीथेन उत्सर्जन बढ़ाने में अहम् भूमिका अदा करती है।

-ज्ञानेन्द्र रावत





 

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