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राहुल से मोदी को मिलेगी बड़ी चुनौती?

Saturday, January 05, 2019 09:30 AM

राहुल गांधी (फाइल फोटो)

यह देखना दिलचस्प है कि 2018 के पहले शांत, सदाशय, शर्मीले और मृदुल दिखने वाले राहुल गांधी इस साल कैसे पूरी आक्रामक और उग्र मुद्रा में आ गए। जानकार बताते हैं कि यह बीच में उनके महीने भर कहीं अंतर्ध्यान हो जाने का कमाल है। लौटकर वह रैलियों में कुर्ते की बांहें चढ़ाते और कागज फाड़ते नजर नहीं आए बल्कि उनकी देहभाषा और बोलने की शैली ही बदल गई। संसद में किसी कवि की तरह उन्होंने मोदी और भाजपा को खुला संदेश दे डाला कि आप मुझे गाली दे सकते हैं, पप्पू कह सकते हैं, मगर मेरे भीतर किसी तरह की घृणा नहीं है।

मैं आपके भीतर से घृणा को निकाल फेंकूंगा और प्यार भर दूंगा। राहुल अब कागज पर लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते और मूल मुद्दों को लेकर तथ्यों के साथ सरकार पर प्रहार करते हैं। पहले की तरह वह हिंदी में लटपटाते भी नहीं और खुद सड़क पर उतर कर सामने से नेतृत्व करने में भरोसा करने लगे हैं, जिसका सबूत उन्होंने सीबीआई वाले घटनाक्रम और किसान रैलियों में उपस्थित होकर दिया। वर्ष 2017 के आखिर में हुए गुजरात विधानसभा चुनाव राहुल गांधी और उनकी छवि के लिए टर्निंग प्वाइंट माने जा सकते हैं। मई 2018 में कर्नाटक के चुनाव राहुल गांधी की सूझबूझ का परिचायक बनकर उभरे।

इसमें न सिर्फ कांग्रेस को सर्वाधिक मत (38प्रतिशत, 78 सीटें) प्राप्त हुए बल्कि जेडीएस (18.3 प्रतिशत, 37 सीटें) से चुनाव बाद गठबंधन संभव करते हुए एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाकर उन्होंने सबसे ज्यादा सीटें (36.2 प्रतिशत, 104 सीटें) जीतने वाली भाजपा को सत्ता से वंचित कर दिखाया और भाजपा को गोवा काण्ड दोहराने नहीं दिया। इसके अलावा उन्होंने युवा नेताओं को ज्यादा तरजीह देने के चक्कर में बुजुर्ग और अनुभवी नेतृत्व को दरकिनार नहीं किया। 2018 में राफेल और किसान को एक साथ साधने वाली राहुल की रणनीति और उत्तर से लेकर दक्षिण तक की सक्रियता ने यह मिथ भी तोड़ दिया कि वह पार्ट टाइम राजनीतिज्ञ हैं।

साल 2018 में एक बड़ी तब्दीली यह देखने को मिली है कि राहुल गांधी पीएम नरेंद्र मोदी और आरएसएस को आमने-सामने मुकाबला करने की चुनौती देने लगे। राहुल ने ललकारते हुए कहा था कि सारी संस्थाओं में संघ की विचारधारा के लोगों को डाला जा रहा है। नरेंद्र मोदी जी पार्लियामेंट में खड़े होने से घबराते हैं। राफेल घोटाले पर, नीरव मोदी पर 15 मिनट मेरी वहां बात करा दो, मोदी जी खड़े नहीं रह पाएंगे। स्पष्ट है कि अब राहुल और मोदी का मुकाबला डेविड और गोलिएथ वाला किस्सा नहीं रह गया है। विश्लेषक विजय शंकर चतुर्वेदी बताते हैं कि राहुल गांधी के लिए राहत की बात यह है कि अब उन्हें देश के नौजवान गंभीरता से लेने लगे हैं और जनता उनके वादों पर कान देने लगी है।

लेकिन राजनीति में इस कदर उभर जाने से 2019 में राहुल को बड़ी जिम्मेदारियां उठानी पड़ेंगी। सबसे पहले तो उन्हें कांग्रेस के अजगरी संगठन को जागृत व प्रेरित करना होगा और आगामी आम चुनाव में अपना लोहा मनवाना होगा, जो समान विचारों वाले दलों का साथ लिए बिना संभव नहीं है। उन्हें राबर्ट वाड्रा, अगस्ता वेस्टलैंड और नेशनल हेराल्ड जैसे विवादास्पद मामलों को भी झेलना पड़ेगा। एक तरफ  उन्हें भाजपा की मुंहजोर शैली से कन्नी काटते हुए मोदी जी का प्रतिरूप बनने से बचना होगा, दूसरे देश में बढ़ती असहिष्णुता और विद्वेष वाली राजनीति की काट निकालनी पड़ेगी।

संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण और अवमूल्यन रोकने की दोहरी चुनौती उनके सामने होगी, क्योंकि इसकी नींव डालने का इल्जाम कांग्रेस के सर पर ही है। कांग्रेस को यह भरोसा भी दिलाना होगा कि राहुल जो लड़ाई लड़ रहे हैं, वह सिर्फ  भाजपा और मोदी को अपदस्थ करने की नहीं बल्कि देश और जनता के हित की साझा लड़ाई है, नौकरीपेशा नागरिकों, किसान-मजदूरों, छोटे और मझोले उद्यमियों तथा हस्तशिल्पकारों को फिर से पैरों पर खड़ा करने की जद्दोजहद है।

फिलहाल यह बताना जरूरी है कि राहुल गांधी ने अपने काम की शुरुआत कमजोरियों की पहचान कर और कमियों को दूर कर विधिवत तरीके से की। उन्होंने मोदी को उनके ही तरीके से पछाड़ने की शुरुआत की। राहुल ने सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति बढ़ाई और हल्के-फुल्के और कई बार कठोर ट्वीट और पोस्ट के जरिए लोगों से जुड़ाव बनाया। राहुल ने लगातार आम आदमी के मुद्दे जैसे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, किसानों की दुर्दशा, नोटबंदी, मूल्य वृद्धि जैसे मुद्दों पर मोदी पर निशाना साधा और भाजपा नेता को अमीरों के दोस्त बताने की कोशिश की।

उन्होंने भाजपा को उनके ही मूल मुद्दों जैसे राष्टÑीय मुद्दों पर घेरा। राहुल ने डोकलाम के समीप चीनी सेना के निर्माण कार्य पर सरकार की चुप्पी और जम्मू एवं कश्मीर में पाकिस्तान की ओर से लगातार घुसपैठ पर निशाना साधा। राहुल ने फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान सौदे पर लगातार नरेंद्र मोदी पर निशाना साध कर उनकी इस छवि को तोड़ने की कोशिश की कि वह श्निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं हैं। उन्होंने खुद के दम पर प्रेस वार्ता, ट्वीट, भाषणों और चौकीदार ही चोर है के नारों से राफेल सौदे को राष्टÑीय मुद्दा बना दिया। उन्होंने विदेश में मोदी की प्रवासियों के बीच पहुंच का जवाब देने के लिए विदेश यात्राएं कीं।

राहुल ने नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर के खराब क्रियान्वयन की वजह से अर्थव्यवस्था के सुस्त होने और नोटबंदी की वजह से नौकरियों में कमी आने का मुद्दा उठाया, जिस पर सरकार को रक्षात्मक रवैया अपनाने पर मजबूर होना पड़ा। इस प्रकार कह सकते हैं कि राहुल गांधी ने जिस तरह से खुद को परिमार्जित किया है, उससे स्पष्ट है कि भाजपा के लिए वर्ष 2019 में वे बड़ी चुनौती बनने जा रहे हैं।


- राजीव रंजन तिवारी
 

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