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एक साथ कई संदेश दे गए हैं पुतिन

Saturday, October 13, 2018 08:30 AM

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दो दिन की भारत यात्रा कई अर्थों में महत्वपूर्ण रही । भारत के नजरीए से इस यात्रा के महत्व को समझने व इसको सरल शब्दों में विवेचित करने के लिए पुतिन के पुरे दौरे को मोटे रूप से तीन भागों में बांटते हैं। प्रथम, स्वागत का चरण। द्वितीय, समझौता वार्श्रा व तृतीय, यात्रा के समापन के अवसर पर दिया गया संयुक्त वक्तव्य। संभवत यह पहली दफा है, जब भारत ने किसी बड़ी महाशक्ति के शासनाघ्यक्ष के दौरे को इतने सधे हुए कदमों से चलकर मुकाम तक पहुंचाया हो। पुतिन के स्वागत से लेकर यात्रा के समाप्ति तक भारत ने हर मौके पर जबरदस्त कुटनीति का परिचय दिया।

कोई संदेह नहीं कि व्लादिमीर पुतिन की इस यात्रा पर न केवल अमेरिका बल्कि चीन व पाकिस्तान टकीटकी लगाए हुए थे। देखा जाए तो पुतिन अपने इस दौरे से तीनों ही देशों के लिए कोई न कोई संदेश छोड़ गए हैं। पुतिन के स्वागत के लिए पीएम नरेन्द्र मोदी का एयरपोर्ट पर न पहुंचना एक बारगी तो अटपटा जरूर लगा। लेकिन संभवत: यह भारत की कोई सोची-समझी कूटनीति ही रही होगी। दरअसल पुतिन के इस दौरे के दौरान भारत-रूस के  बीच बहुप्रतिक्षित एस-400 एयर सिसटम के खरीद किए जाने के समझौते पर हस्ताक्षर होने थे। अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत, रूस के साथ यह सौदा करे। इसके लिए वह लगातार भारत पर दबाव डाल रहा था। यहां तक की ट्रंप ने भारत पर प्रतिबंध लगाने की बात भी कही थी। ऐसे में भारत ने पुतिन के स्वागत में अति उत्साह का प्रदर्शन न कर अमेरिका को संशय में डाले रखा।

अमेरिका पुरे घटनाक्रम को समझ पाता उससे पहले भारत ने एस-400 एयर डिफेस सिस्टम की डील पर हस्ताक्षर कर दंभी ट्रंप को पटकनी दे दी। अगले दिन मोदी और पुतिन की बातचीत के बाद दोनों देशों के सांझा बयान में जिस तरह सीमा पार से आतंकवाद के खिलाफ बिना किसी दोहरे मापदंड के  निर्णायक लड़ाई का आह्वान किया गया, उसमें पाकिस्तान के साथ-साथ चीन के लिए भी संदेश छिपा था। पुतिन यहां भारत-रूस के बीच होने वाली 19वीं वार्षिक शिखर बैठक में भाग लेने के लिए भारत आए थे। वार्षिक शिखर बैठक हर साल क्रमश: दिल्ली और मास्को में रखी जाती है।

रूस भारत का महत्वपूर्ण रक्षा सहयोगी है। दोनों देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्तों का लंबा इतिहास रहा है।लेकिन हाल के वर्षों में रूस ने जिस तरह से भारत की सुरक्षा चिंताओं को दरकिनार करते  हुए चीन और पाकिस्तान से अपनी नजदीकी बढाई है, उससे दोनों देशों के संबंधों में बदलाव आया है। रूस की इस बदलती रणनीति के लिए जहां एक ओर वैश्विक परिस्थितयां उतरदायी हैं, वही भारत के स्वयं के सामरिक हित भी कम निर्णायक नहीं है। पिछले एक-डेढ़ दशक में जिस तरह से भारत अपने हितों की पूर्ति के लिए अमेरिकी पाले में गया है, उसको देखते हुए रूस ने चीन और पाकिस्तान के साथ संबंध बढ़ाने जरूरी समझ लिए।

उक्त परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में पुतिन का यह दौरा दोनों ही देशों के लिए अहम था। उम्मीद की जा रही थी कि  मोदी-पुतिन वार्ता के दौरान दोनों देश अपने तात्कालिक हितों को बनाए रखने के साथ-साथ लंबे परम्परागत ऐतिहासिक संबंधों के प्रकाश में दीर्घकालिक हितों को मजबूत करने की दिशा में प्रयास करेंगे। वार्ता के बाद जारी साझा बयान को देखते हुए यह लग रहा है कि दोनों देशों के बीच जारी शंकाओं और आशंकाओं के बादल अब छंट गए है।

इतिहास में अगर थोड़ा सा पीछे जाएं तो बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के दौरान रूस तमाम तरह की शंकाओं और आशंकाओं को निर्मूल साबित करते हुए भारत के पक्ष में दृढ़ता के साथ खड़ा रहा। भारत-रूस मित्रता अक्टूबर 2000 में उस समय और अधिक मजबूत हुई जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति पुतिन ने ’भारत-रूस रणनीति साझेदारी’ के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। आज भी दोनों देश कई बहुपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक दूसरे का सहयोग कर रहे हैं। शंघाई सहयोग संघ (एससीओ) में भारत की सदस्यता के लिए रूस ने उल्लेखनीय प्रयास किए। उसने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का हमेशा समर्थन किया है। भारत का कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट रूस की मदद से ही बनाया जा रहा हैं। लेकिन हालिया परिस्थितियों में दोनों देश मित्रता के परस्पर विपरित मोर्चें पर खडे दिखाई दे रहे थे।

दरअसल अमेरिका के साथ भारत के बढ़ते रिश्तों को देखते हुए रूस को यह लगने लगा था कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अमेरिका से बड़ी मात्रा में हथियारों की खरीद कर रहा है। आंकड़ों पर गौर करें तो एक हद तक यह सही भी है। पिछले एक-डेढ दशक में भारत ने रूस की तुलना में अमेरिका से अधिक हथियार आयात किए हैं। दो दशक पहले तक भारत 80 फीसदी रक्षा उपकरण रूस से खरीद करता था जो अब घटकर 60 फीसदी रह गया हैं। इस बदलाव की दो बड़ी वजह है। प्रथम, वैश्विक स्तर पर जिस तरह से भूराजनीतिक स्थितियां बदल रही हैं

उसमें भारत ही नहीं बल्कि दुनिया का कोई भी देश अपनी रक्षा जरूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता है। द्वितीय, चीन द्वारा भारत के इर्दगिर्द जिस तरह की व्यूह रचना की गई है, उसे देखते हुए भारत के लिए अत्याधुनिक उच्च तकनीक के हथियार खरीदना जरूरी हो गया है। भारत को लगता है कि उसे अपनी सामरिक सुरक्षा के लिए अमेरिका से उच्च तकनीक के हथियार मिल सकते है।  टू प्लस टू वार्ता के बाद अब यह माना जा रहा है कि अगले तीन से चार दशकों में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी होगा। जाहिर है उक्त परिस्थितियों में रूस का नजरिया बदलना ही था।    

-एन.के.सोमानी








भारत भी इस बात को अच्छे से जानता है कि वह रूस की शर्त पर अमेरिका से संबंध नहीं बढ़ा सकता है। इस लिए वह रूस के साथ सहयोग को बनाये रखने हेतू दूसरे विकल्पों की तलाश कर रहा था। पुतिन का दौरा भारम के लिए एक अच्छा अवसर था। भारत ने भी इस अवसर को बिना गवाए विश्वास बहाली की दिशा में आगे बढने के लिए विवादास्पद मुद्दों को वार्श्रा की टेबल से दूर ही रखा। हालांकी आर्थिक और रणनीतिक मोर्चें पर आज भी दोनों देशों के बीच विश्वास बरकरार है। पीछले पांच सालों में भारत ने अपने कुल हथियार आयात में 62 प्रतिशत से अधिक रूस से आयात किये हैं। दोनों देशों ने साल 2025 तक द्विपक्षीय व्यापार को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में बीते 4 दशक से दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं।
यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में कुल आठ समझौते हुए। इसमे एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली के अलावा अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय एजेंसी इसरो एवं रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकास्तॉस के बीच सहयोग पर करार हुआ हैं। इसके तहत रूस, भारत के महत्वाकांक्षी मिशन गगनयान में सहयोग करेगा। इसके अलावा नेचुरल रिसोर्स, एचआरडी, सौर ऊर्जा, टेक्नोलॉजीे व परमाणु क्षेत्र में सहयोग के समझौते पर हस्ताक्षर किए गए है।पुतिन ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की चिंताआें को समझते हुए आतंकवाद विरोधी अभियान में सहयोग का वचन दिया साथ ही उन्होंने भारत को उचित किमत पर गैस उत्पादन की सुविधा उपलब्ध कराने की बात भी की।पुतिने ने ब्लाडिवोस्टक फोरम में पीएम मोदी को मुख्य अतिथि की हैसियत से शामिल होने का निमंत्रण भी दिया है।
क्रीमिया पर कब्जे के बाद पुतिन जिस तरह से अपने बहुधु्रविय विश्व व्यवस्था वाले एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहते हैं, उसमें भारत बड़ा मददगार साबित हो सकता है। हालांकी पाकिस्तान व चीन के साथ रूस के अपने हित जुडेÞ हैं। भारत को खुश करने के लिए पुतिन चीन और पाकिस्तान के प्रति अपनी हालिया नीतियों में बदलाव करेगें इसकी संभावना नहीं के बराबर है। फिर अगर पीएम मोदी पुतिन को भारत-चीन-पाकिस्तान के साथ संबंधों में सतुलन के लिए राजी कर लेते हैं तो भारत की एक बड़ी कूटनीतिक जीत होगी।
भारत को भी इस तथ्य को नहीं भूलना चाहिए कि व्लादीमिर पुतिन 2024 तक रूस की सश्रा में रहेंगे। अर्थात दोनों देशों के पास लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ काम करने के मौके हैं। सीरिया में अमेरिकी-इसरायल गठबंधन पर जीत के बाद जिस भारी भरकम सैन्य साजो-समान के साथ उन्होंने चीन के सहयोग से वस्टोक-2018 किया है, उससे पुतिन के इरादे प्रकट हो जाते हैं। ऐसे में भारत को पांरम्परिक मित्र और नए मित्र के बीच के अंतर को समझकर उसी के अनुरूप रूस व अमेरिका के साथ अपने संबंधों को विकसित करना चाहिए। वैश्विक स्तर पर अभी जो परिस्थितयां और हालात बन रहे हैं, उनमें न तो भारत रूस को छोड़ना चाहेगा न रूस भारत को। इस लिए बेहतर यही होगा कि दोनों देश अतीत के पुराने संबंधों के प्रकाश में ही वर्तमान स्थितियों से निबटने का प्रयास करे। निसंदेह पुतिन एक बड़ी डील कर कामयाब बिजनसमैन के रूप में मास्को लौटे हैं, तो दूसरी ओर नई दिल्ली ने भी रूस के साथ संबंधों को पुन:पटरी पर लाकर बड़ी कुटनीतिक जीत हासिल की।

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