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सियासत और किसान

Tuesday, February 05, 2019 10:45 AM

राज्य-मंत्रणा के मंच पर आज फिर किसानों को लेकर चर्चा चल रही थी। चर्चा क्यों ना चले, आखिर अन्न पैदा करने में किसान ब्रह्मा के समान होता है। खेती उसके ईश्वरीय प्रेम का केंद्र है। उसका सारा जीवन पत्ते-पत्ते में, फूल-फूल में, फल-फल में, बिखर रहा है। लेकिन आजकल किसान इसलिए भी प्रिय है कि उसके पास वोट भी है। और लोकतंत्र में वोट का महत्व होता है। खासकर भारत जैसे कृषि प्रधान और लोकतांत्रिक देश में जहां सत्तर फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है। अब चूंकि देश में तीन माह बाद आम चुनाव होने जा रहे हैं, ऐसे में इसकी याद राजनेताओं को आना स्वाभाविक है। ऐसे में चुनाव से पहले इस वोट-बैंक को रिझाने के हर दल बढ़ चढ़ कर उनकी बेहबूदी के लिए घोषणाओं और वादों के अंबार लगाते हैं।

कोई कर्जमाफी का वादा करता है, तो कोई सहायता बतौर सालाना उसके खाते में हजारों रुपए डालने और पेंशन देने के वादे करता है। खैर, राज्य-मंत्रणा के मंच पर विराजे बैठे-ठालों को किसानों की कर्जमाफी के दौर में अचानक किसानों के दिए जाने वाले कर्जों की शर्तों और उनकी फसल बीमा की याद आई। एक विशेषज्ञ बोले-फसल बीमा कराने के बावजूद किसानों को प्राकृतिक आपदाओं या अन्य विपदाओं में फसल के खराबे की पूर्ण क्षतिपूर्ति नहीं की जाती। मुआवजा बतौर किसी को तीस, तो किसी को पैंतीस और किसी को पिचहत्तर रुपए के चैक मिलते हैं। ऐसे मुआवजों को पाकर किसान अपना माथा पीट लेता है।

पंचायत गांव की हो या प्रदेश की या देश की सबसे बड़ी पंचायत किसान को ठीक मुआवजा देने के रोळे और सहानुभतियां तो थोक के भाव सुनने को मिल जाती हैं, लेकिन मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरे से भी कम मिल पाता है। इस मुद्दे पर चल रही बातचीत में अचानक शामिल होने आ गए अपने खुशबीर सिंह साहब। अपने मारवाड़ जंक्शन वाले विधायकजी। बताया-पूछो मत, एक विसंगति हो तो बताएं। जिधर देखो, उधर विसंगति। पहले तो कृषि और उद्योगों की ऋण नीति ही विसंगतिपूर्ण है। किसान बैंक से कर्जा लेवे, तो उसे उसकी पुश्तैनी जमीन को बैंक को रहन पर देना पड़ता है। अपनी जमीन (खसरा नम्बर) का फलल बीमा करवाकर भी फसल नष्ट होने पर क्लेम का फायदा नहीं ले पाता।

कारण-सरकार ने बीमा के मापदंडों में पूरी तरह तहसील को यूनिट माना है। जबकि प्राकृतिक आपदा-ओलावृष्टि, अनावृष्टि, पाला और अतिवृष्टि की सीमा तय नहीं होती है। इसके ठीक विपरीत वाहन बीमा नीति देखिए, वाहन नम्बर विशेष के दुर्घटनाग्रस्त होन पर क्लेम राशि दे दी जाती है। किसान को अपनी फसल नष्ट होने पर ऋण जमा नहीं कराने पर तो उसके घर के आगे ढोल बजाकर भूमि कुड़क कर ली जाती है। दूसरी ओर उद्योगों की के लिए सरकार जमीन, कर्ज, अनुदान उपलब्ध करवाती है।

सभी सुविधाएं देने के बाद भी उसमें कोई उत्पाद नहीं हुआ या ऋण जमा नहीं कराया तो उसे बीमारू उद्योग की श्रेणी में मानकर फिर से सहायता दे दी जाती है। एक ही देश में दोहरे मापदंड क्यों? खेती को भी उद्योग का दर्जा दिया जाए। किसान के ऋण के लिए भूमि रहन नियम समाप्त कर, भूमि के खसरा नम्बर को आधार माना जाए क्योंकि गिरदावर पटवारी द्वारा प्रत्येक खसरा नम्बर का भौतिक सत्यापन के बाद ही गिरदावरी रिपोर्ट दी जाती है। अब हम तो क्या कहें किसान की इस पीड़ा पर, दो लाइनें पेश कर देते हैं-

ये सिलसिला यूं ही चलते रहेगा।
सियासत अपनी चालों से कब तक
किसान को छलता रहेगा।
- महेश चन्द्र शर्मा

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