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हमारा संविधान और हमारा लोकतंत्र

Saturday, December 01, 2018 10:15 AM

हमारा संविधान

आपको याद होगा कि 26 नवंबर 1949 को हमारे स्वतंत्र देश की पहली संविधान सभा ने भारत के संविधान को अपनाया था जो 26 जनवरी 1950 में लागू हुआ था। डॉ. भीमराव आम्बेडकर हमारे संविधान की प्रारूप समिति के सभापति थे और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्ष थे। ब्रिटिश भारत की विधानसभाओं से चुने गए 296 सदस्यों की इस संविधान सभा में कांग्र्रेस, मुस्लिम लीग (208) यूनियनिस्ट (1) यूनियनिस्ट मुस्लिम (1) यूनियनिस्ट अनुसूचित जातियां (1) कृषक प्रजा (1) अनुसूचित जाति परिसंघ (1) सिक्ख (गैर कांग्र्रेसी-1) कम्युनिस्ट (1) और स्वतंत्र (8) सदस्य थे।

याद रहे 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त भारत में तब कांग्र्रेस ही आजादी के आंदोलन की महत्वपूर्ण पार्टी थी और तब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अथवा जनसंघ और भाजपा किसी राजनैतिक पार्टी के रूप में संविधान पटल पर नहीं थी। हमारा ऐतिहासिक संविधान इस तरह प्रस्तावित और पारित हुआ। जिसे हम भारत का विचार (आइडिया आॅफ इण्डिया) के रूप में भी याद कर सकते हैं।

संविधान की उद्देशिका कहती है- हम भारत के लोग, भारत को एक (सम्पूर्ण प्रभुत्व- सम्पन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्म गणराज्य) बनाने के लिए उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और (राष्ट्र की एकता और अखण्डता) सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज 26 नवंबर 1949 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत दो हजार छह) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

भारत का ये संबंधित दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है जिसमें 448 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां व सौ से अधिक संशोधन आज तक हैं। इस महान देश में न्याय का महत्व इसकी मानव सभ्यता और विकास से स्थापित है और इतिहास भी बताता है कि वैदिक काल (3000-1000 ईसा पूर्व के आसपास) से ही हमारे मानव समाज में लोकतांत्रिक चिंतन तथा व्यवहार लोगों में घर कर गए थे। ऋगवेद तथा अथर्ववेद में सभा समिति (वयोवृद्धों की सभा) का उल्लेख आता है तथा एतरेय ब्राह्मण, पाणिनी की अष्टाध्यायी, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, महाभारत, अशोक स्तंभों पर उतकीर्ण शिलालेख, उस काल के बौद्ध तथा जैन ग्र्रंथ और मनुस्मृति, ये सभी गवाह हैं कि भारतीय इतिहास के वैदिकोत्तर काल में अनेक सक्रिय गणतंत्र थे जो विधि के शासन संचालित थे।

वस्तुत: यह राज्य व्यवस्थाएं जनता के बहुमत (धारणा) के अनुसार काम करती थी। उस समय के मनुमहर्षि लिखते हैं कि जिस प्रकार पागल कुत्ते को मार दिया जाता है उसी प्रकार अन्याय तथा अत्याचारी राजा को उसकी अपनी प्रजा द्वारा मार दिया जाना चाहिए। लेकिन जैसे-जैसे हमारे देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षणिक विकास हुआ, हमारे समाज ने शक, हवा, मुगल और अंग्र्रेजी शासन और गुलामी से बहुत कुछ खोया और पाया लेकिन न्याय की इच्छा और अवधारणा कभी समाप्त नहीं हुई। ये हजारों साल की भारत यात्रा के अनुभव और खोज का ही परिणाम हमारा संविधान और हमारा लोकतंत्र है। डॉ. आम्बेडकर की सूझ-बूझ और साहसिक ज्ञान का ही आज ये प्रतिफल है

कि देश एक व्यक्ति-एक वोट के मताधिकार से विधि का शासन अखण्ड और आदरणीय है। 26 नवंबर, 1950 को स्थापित भारतीय गणतंत्र, इसीलिए इस दिन को राष्ट्रीय संविधान के रूप में याद करता है। इसी अवसर पर पिछले दिनों भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने भी हमें याद दिलाया था कि भारत का संविधान इस लोकतंत्र के हाशिये पर खड़े हम भारत के लोगों की आवाज है तथा बहुमत के विवेक की भी पुकार है। धर्म, आस्था और आग्र्रहों की राजनीति के बीच मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मुश्किल के समय में भी हमारा संविधान ही हमारे लोकतंत्र को रास्ता दिखाता है। हमारा सबका भला इसी में है कि हम संविधान की सलाह पर चलें।

यदि ऐसा नहीं हुआ तो इसके गंभीर परिणाम होंगे और अराजकता बढ़ेगी। न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि संविधान हम भारत के लोगों की अन्तर्आत्मा की आवाज है। जिसे सुना-समझा जाना चाहिए। यही बात 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में कही थी कि ये संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि वे लोग जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाए, खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान भी खराब सिद्ध होगा। संविधान केवल विधायिका, कार्य पालिका और न्याय पालिका जैसे राज्यों के अंगों का प्रावधान कर सकता है।

कौन कह सकता है कि इस संविधान का संचालन आगे चलकर कौन और कैसे लोग और कैसे राजनैतिक दल और जाति-धर्म-संप्रदायों के लोग करेंगे। क्या भारतवासी देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे? मैं नहीं जानता। लेकिन एक बात निश्चित है कि यदि राजनैतिक दल अपने पंथ को देश से ऊपर रखेंगे तो हमारी स्वतंत्रता एक बार फिर खतरे में पड़ जाएगी और संभवत: हमेशा के लिए खत्म हो जाए।

-वेदव्यास
 

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