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अब बिजली कड़की!

Monday, December 03, 2018 09:40 AM

आज राज्य-मंत्रणा के मंच पर ‘बिजली’ कड़क रही थी। विशेषज्ञ बता रहे थे, चुनावी-मैदान में बिजली के चमकने, कड़कने और गिराने के मायने। बिजली की प्रकृति है कि वह माहौल बनने पर ही चमकती है। मौसम बारिश का हो या फिर बेमौसम बरसात का। कोई अपने मन में कुछ भी भ्रम पाले या भय से ग्रसित हो, यह न किसी से तुष्ट होती है और ना ही किसी पर खीजती है। वह तो केवल अपनी गति से चलती है और घूमती है। यह भी नहीं देखती कि वह कब, किस पर, और कहां गिरेगी? भले ही लोग परस्पर यह दावा करते फिरें कि बिजली तो हमने गिराई है।

इन दिनों वैसे ही चुनावी-मौसम पूरे यौवन पर है। ऐसे में राजनेताओं का ‘चमकना’ और एक दूसरे को ‘चमकाना’ बनता भी है। सत्तारूढ़ दल इस मौसम में प्रदेश के आकाश में अपनी उपलब्धियों को बार-बार कौंध-कौंधकर चमकाता है। तो इसके विपरीत विपक्षी दल ढूंढ़-ढूंढ़कर बिजली गिराने के मुद्दों से सत्तारूढ़ दल के चमकाने के उद्यम में रहते हैं। मुद्दों को ढूंढने में भले ही वे खुद आरटीआई की मदद लें, या ऐसी एजेंसियों की महारथ से जुटाई सूचनाओं के जरिए बौछारें करें। यह खुद को चमकाने और दूसरों पर बिजली गिराने के लिए जरूरी भी है। इस पुण्य-कर्म में सत्तारूढ़ और विपक्षी दल दोनों को महारत हासिल है। बिजली है ही ऐसी। इसकी दरें भी गजब ढाती हैं।

घटाई तो वाहवाही। बढ़ाई तो अब तक जुटाया श्रम स्वाहा। जनता सरकार पर अपनी भरपूर शक्ति के साथ कड़कड़ाहट के साथ बिजली गिरा देती है। कई बार बढ़ाई गए दामों की बिजली से खुद सरकारें जल उठी हैं। दूसरी बार बढ़ाने की बात तो दूर सोचने के लिए भी छाछ को फूंक-फूंककर पीनी पड़ी है। भले ही कंगाली तक जा पहुंची बिजली कंपनियों के घाटे कि लिए ‘उदय’ जैसी योजनाओं के जरिए कर्ज लेकर अपनी अस्तागति को रोकना पड़े। भले ही लोग बिजली लाइनों पर आकड़े डालकर बिजली चोरी करें, कर्मचारियों के भ्रष्ट तरीकों से राजकोष को घाटा पहुंचे। चोरी पकड़ने गए, या बकाया दामों की वसूली करने गए दलों पर भाई लोग बिजली गिराने के साथ उनके सिर फोडे । सतर्कता दल भाग छूटें।

इस बार बिजली को पकड़कर लाए रणदीप सुरजेवाला। वो भी दिल्ली से। खोजी आरटीआई एजेंसियों की ओर से जुटाई सामग्रियों के दम पर। जयपुर आते ही भाजपा सरकार पर धावा बोला-बीते पांच सालों में निजी कंपनियों से बिजली को महंगा खरीदा गया। इससे सरकारी खजाने को 6670 करोड़ का चूना लगा। लगे हाथ छिपे मर्म को उजागर किया कि यह सब अपने पूंजीपति मित्रों को उपकृत करने के इरादे से किया। निजी कंपनियों ने लाभ गटका और  सरकारी कंपनियां कंगाली के कगार पर पहुंचा दीं। कांग्रेस सत्ता में आई तो सरकारी कंपनियों के उत्पादन को बढ़ाने पर जोर देंगे।

आदिवासी क्षेत्रों में चुनाव प्रचार कर रही मुख्यमंत्री वसुंधराराजे ने खुद जवाबी मोर्चा खोला, बोलीं-हम पर आरोप लगाने वाले पहले अपनी गिरेबां में झांकें। वे यह क्यों नहीं बताते कि अनुबंध तो उन्हीं की यानी कांग्रेस सरकार के दौरान हुआ था। वह भी वर्ष 2013 के चुनावों से पहले पूंजीपति मित्र अडानी के साथ। अब हम तो क्या बोलें, एक मशहूर शायर का यह शेर पढ़ देते हैं-
फरेब-ए-रौशनी में आने वालों मैं न कहता था। कि बिजली आशियाने की निगहबां हो नहीं सकती। 

- महेश चन्द्र शर्मा

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