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भारत में नोट बंदी का आंकलन

Saturday, September 08, 2018 08:45 AM

भारतीय रिजर्व बैंक(फाइल फोटो)

भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर, 2016 को नोट बंदी का ऐतिहासिक एवं अभूतपूर्व निर्णय लिया था जिसके अन्तर्गत तुरन्त प्रभाव से 500 रुपए एवं 1000 रुपए मानक वाली मुद्रा का चलन बंद कर दिया गया था। इस निर्णय से लगभग 87 प्रतिशत मुद्रा एकदम से चलन से बाहर कर दी गई थी।

पुराने नोटों के बदले 500 रुपए एवं 2000 रुपए के मानक की नई मुद्रा जारी की गई थी जिसका वितरण राष्ट्रीयकृत बैंकों के माध्यम से केन्द्रीय बैंक द्वारा किया गया था लेकिन यह वितरण अत्यंत असुविधाजनक था जिसकी कीमत आमजन को अपनी पुरानी मुद्रा को लाईन में लगकर नई मुद्रा में प्राप्त करने में करनी पड़ी थी।

यह कहा गया था कि कोई भी जब बड़ा एवं अहम् फैसला लेना होता है तो उसकी कीमत तो चुकानी पड़ती है। नई मुद्रा की आपूर्ति पर्याप्त नहीं होने तथा दूसरी तरफ पुरानी मुद्रा को एक साथ बदलवाने की होड़ ने वितरण व्यवस्था को कष्टकारी बना दिया था। नकदी संकट पैदा होने से तरलता का संकट पैदा हुआ था। किसान, व्यापारी, उद्योगपति, कर्मचारी, दैनिक मजदूर आदि सभी वर्ग प्रभावित हुआ।

लेकिन इस निर्णय को लगभग 2 वर्ष हो गए है जबकि नोट बंदी का कार्य लगभग समाप्त हो गया है। केन्द्र सरकार का यह अनुमान था कि नोट बंदी के निर्णय से लगभग 3 लाख करोड़ रुपए बैंकों के पास वापस बदलने के लिए नहीं आएंगे जो कि काली मुद्रा होगी या नकली मुद्रा। यह अनुमान सही साबित नहीं हुआ है। हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने नोट वापसी की मुद्रा की गिनती का कार्य सम्पन्न किया है जिसका उल्लेख वित्त वर्ष 2017-18 के लिए जारी वार्षिक रिपोर्ट में किया गया है।

वार्षिक रिपोर्ट, 2017-18 में उल्लेख है नोट बंदी के निर्णय के समय 500 एवं 1000 रुपए वाले 15.41 लाख करोड़ मूल्य के नोट चलन में थे लेकिन उसमें से 15.31 लाख करोड़ रुपए मूल्य की मुद्रा लौटकर वापस आ गई है। इसका आशय है कि केवल 10 हजार करोड़ की मुद्रा की बैंकों में वापस नहीं आई है। यहां पर यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि सरकार का यह मानना था कि 3 लाख करोड़ रुपए के बराबर मुद्रा वापस नहीं आएगी जो कि कालाधन मानी जा सकती है।

यह आशंका थी कि काला धन लौटकर नहीं आएगा लेकिन वह तो आ गया केवल 10 हजार करोड़ रुपए का नहीं आना तो ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। ऐसी स्थिति में यह नोट बंदी का निर्णय जोखिम पूर्ण रहा जिसने नकद काले धन पर चोट नहीं की।भारत में काला धन नकद में उतना नहीं है जितना की जमीन-जायदाद, सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात, खनिज पदार्थ आदि के रूप में है।

नोटबंदी के समय यह कहा गया था कि इस निर्णय से काला धन प्रतिबंधित होगा, भ्रष्टाचार रूकेगा, आतंकवाद के लिए कोष पर चोट लगेगी तथा जाली मुद्रा के चलन पर रोक लगेगी। भारत में डिजिटलीकरण को बढ़ावा मिलेगा। जिसके अन्तर्गत नकद भुगतान व्यवस्था के स्थान पर बैंकों के माध्यम से भुगतान किए जाएंगे। डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, आॅन लाइन भुगतान व हस्तांतरण व्यवस्था प्रोत्साहित होगी। कर भुगतान में पारदर्शिता आएगी तथा कर चोरी पर प्रभावी रोक लगेगी।

सवाल यह है कि इनमें से किस उद्देश्य की पूर्ति हो पाई है। नोट बंदी ने सकल घरेलू उत्पाद को घटाया है जो कि लगभग 2.25 लाख करोड़ रुपये के बराबर रहा है। दैनिक मजदूरी दर को घटाया है तथा बेरोजगारी को बढ़ाया है। किसानों का ऋण बोझ बढ़ा है तथा लघु उद्योग धंधे बंद हुए है। भारत में नकद व्यापार का अत्यधिक चलन है जो कि एक चक्र को चलाता है। नकदी संकट ने बाजार मांग को घटाया जिसने व्यापार, उद्योग एवं कृषि उत्पादों को मांग में अवरोध पैदा किया है। इसकी भरपाई आज तक भी नहीं हो पा रही है जबकि नई मुद्रा बाजार में आ चुकी है।

लेकिन नकदी लेन-देन पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। सरकार का यह मानना है कि लगभग 3 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा तुलनात्मक रूप से कम चलन में है तथा डिजिटल लेन-देन का चलन अत्यधिक हो रहा है। प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करदाताओं की संख्या तथा कर राजस्व में तेजी से वृद्धि हुई है जो कि कर आधार को बढ़ाता है। नोट बंदी के समय जो राशि बैंकों में जमा हुई, उसका आंकलन नकदी जमा राशि के आधार पर किया गया।

यह नकदी यदि 2.50 लाख रुपये से अधिक की है तो नकदी सीमा के आधार पर नोटिस जारी किए गए तथा उन खाताधारकों को कर के दायरे में आने के लिए बाध्य भी किया गया। आय करदाताओं की संख्या में लगभग 25 प्रतिशत प्रति वर्ष की वृद्धि हुई। जहां तक सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर का सवाल है नोट बंदी के समय लगभग 2 प्रतिशत गिरी थी लेकिन वर्तमान वर्ष की प्रथम तिमाही में वापस 7.5 प्रतिशत से अधिक रही है।

इसमें कोई शक नहीं है कि नोटबंदी ने अल्पकालिक दृष्टि से समस्याओं एवं कठिनाइयों को बढ़ाया है लेकिन कालेधन, भ्रष्टाचार एवं आतंकवाद जैसे मुद्दों पर नजर रखने का कार्य किया है। कम से कम वृद्धि दर को भी रोकने का कार्य किया है। आज स्थिति यह है कि नकदी लेन-देन उतनी आसानी से बड़ी मात्रा में नहीं हो पाता है जो पहले हो पाता था। व्यक्ति, समाज, राजनेता, व्यापारी, उद्योगपति आदि नकदी लेन-देन करने से पहले सोचता है।

लेकिन यह प्रश्न बरकरार है कि नोट बंदी ने गरीबी, बेरोजगारी की समस्या को बढ़ाया है तथा आम जन का संघर्ष बढ़ा है, उसे उतनी ही मजदूरी प्राप्त करने के लिए अधिक श्रम करना पड़ता है। कालेधन धारकों ने अपना पैसा वापस प्राप्त कर लिया लेकिन शिकार बनाया गरीब को। जन धन योजना में एकदम नकदी जमा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। फिर भी यदि भ्रष्टाचार, कालाधन सृजन, आतंकवाद में वृद्धि रूकती है, तो नोट बंदी की भरपाई हो सकती है।
- डॉ. सुभाष गंगवाल

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