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गंगा पर मनमोहन और मोदी

Tuesday, September 11, 2018 15:35 PM

गंगा नदी (फाइल फोटो)

मनमोहनसिंह कहा करते थे कि गंगा मेरी मां है। प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के शीघ्र बाद  नरेन्द्र मोदी ने भी कहा था कि गंगा ने मुझे बुलाया है, अब हमें गंगा से कुछ भी लेना नहीं, बस देना ही है। आइये अब देखें इन्होंने अपने-अपने कार्यकाल में गंगा के लिए क्या किया है।

टिहरी बांध का निर्माण नरसिम्हाराव की कांग्रेस सरकार के दौरान शुरू हुआ था। इसके बाद वाजपेयी की सरकार 1999 में सत्ता में आई और उस समय प्रश्न उठा कि क्या गंगा पर बांध बनाने से गंगा की आध्यात्मिक शक्ति पर दुष्प्रभाव पड़ता है? इस विषय पर तथा टिहरी के भूकंप संबंधी सम्भावनाओं को देखने के लिए मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में वाजपेयी ने एक कमेटी बनाई थी।

इस कमेटी ने भूगर्भीय दृष्टिकोण से टिहरी को हरी झंडी दे दी। गंगा की आध्यात्मिक शक्ति के विषय में कमेटी ने कहा कि 4 इंच की एक पाइप बांध में डाल दिया जाएगा जो गंगा की अविरलता को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त होगी। चार इंच के पाइप से झील में सड़ने वाले पानी निकलने को अविरलता मान लिया गया।

वाजपेयी सरकार यह भूल गई कि अविरलता की जरुरत इसलिए होती है कि झील में रुका हुआ पानी सड़ने लगता है और उसकी आध्यात्मिक शक्ति खत्म हो जाती है। बांध के अवरोध से मछलियां भी आवाजाही नहीं कर पाती और कमजोर हो जाती हैं। टिहरी बांध के ऊपर अब महसीर मछली नहीं पाई जाती है। मछलियां ही पानी में बहने वाली गन्दगी सो साफ करती हैं। मछलियों के कमजोर हो जाने से पानी की गुणवत्ता में गिरावट आती है।

गंगा के लिए समर्पित सानंद स्वामी, डॉ. जी डी अग्रवाल, पूर्व प्रोफेसर, आईआईटी कानपुर का कहना है कि मुरली मनोहर जोशी की इस रिपोर्ट के बाद ही टिहरी के ऊपर लोहारी नागपाल, भैरव घाटी और पाला मनेरी के बांधों को भी शुरू करने का क्रम हुआ। उनका मानना है कि भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद् के सदस्यों ने जब मान लिया कि बांध बनाने से गंगा की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास नहीं होगा तब गंगा पर दूसरे बांधों को बनाने का रास्ता खुल गया।

यद्यपि जोशी रिपोर्ट मूलत: टिहरी बांध के विषय में थी परन्तु इसका दीर्घकालिक प्रभाव हुआ और गंगा के ऊपर अन्य परियोजनाएं भी शुरू हो गईं।मनमोहन सिंह ने 2009 में नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी का गठन किया। इस अथॉरिटी में दस विशेषज्ञ सदस्यों को पूर्ण सदस्य बनाया गया था। इन सदस्यों में श्री राशिद सिद्दकी, सुनीता नारायण, राजेंद्र सिंह, बी डी त्रिपाठी, आर के सिन्हा जैसे गंगा के ऊपर श्रद्धा से काम करने वाले व्यक्ति सम्मिलित थे।

वर्ष 2016 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस अथॉरिटी के पुराने प्रारूप को निरस्त करके नया प्रारूप जारी किया जिसमें अथोरिटी के सदस्य केवल मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री रह गए और व्यवस्था की गई कि एक्सपर्ट्स से चर्चा की जा सकती है। गंगा के बारे में जानकार लोगों का पद सदस्य से घटाकर केवल मांगे जाने पर सुझाव देने का रह गया। जहां तक चर्चा का सवाल है वह तो कभी भी की ही जा सकती है।

प्रारूप में इसे कहना उसी प्रकार है की कहा जाए की सूर्य पूरब में निकलता है। सानंद स्वामी के अनशन के फलस्वरूप मनमोहन सिंह ने गंगा की मुख्य सहायक धारा भागीरथी पर निर्माणाधीन तीन जल विद्युत परियोजनाएं पाला मनेरी, भैरव घाटी और लोहारी नागपाला को निरस्त कर दिया था। इसके सामने मोदी की सरकार के प्रमुख मंत्री नितिन गडकरी नें कहा है कि उनका प्रयास रहेगा कि बंद हुई परियोजनाओं को पुन: शुरू किया जाए।

मनमोहन सिंह की सरकार नें सात आईआईटी के कंसोर्टियम को गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान बनाने का कार्य दिया था। आईआईटी ने यह प्लान बनाकर जनवरी 2015 में केंद्र सरकार को सौंप दिया है। इस प्लान में कहा गया हैकि गंगा को पुनर्जीवित करने के लिए उसके प्रवाह के बहाव की निरंतरता बनाए रखना जरुरी है। आईआईटी ने कहा कि ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट को स्वीकृति नहीं दी जानी चाहिए जिससे कि गंगा की निरंतरता बाधित होती है।

लेकिन आज सरकार इस रिपोर्ट का कोई जिक्र नहीं करती है और न ही इस पर कोई निर्णय लिया है। मनमोहन सिंह की सरकार नें गंगा के ऊपर निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं पर विचार करने के लिए बी के चतुर्वेदी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी नें निर्णय लिया कि जल विद्युत परियोजनाओं को 20 से 30 प्रतिशत पानी, पर्यावरणीय प्रवाह के रूप में निरंतर छोड़ना होगा।

नेशनल ग्रीन ट्रेबुनल नेंदायर की गयी एक याचिका में केरल सरकार ने कहा है कि पर्यावरण मंत्रालय द्वारा इन संस्तुति के अनुसार पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने की शर्त लगाई जा रही है। इसके सामने चार साल बीत जाने के बाद भी वर्तमान में चल रहे जल विद्युत परियोजना जैसे टिहरीए विष्णु प्रयाग, मनेरी भाली इत्यादि से 20 से 30 प्रतिशत पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ने के प्रति मोदी सरकार नें कोई कदम नहीं उठाया है।

आज भी श्रीनगर, टिहरी और विष्णु प्रयाग परियोजनाओं द्वारा पर्यावरण के लिए पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। गंगा के ऊपर ढुलाई करने की योजना बहुत पुरानी है। लेकिन वर्ष 2014 तक मनमोहन सिंह ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं लिया था। नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्तारूढ़ होने के तुरंत बाद सितंबर 2014 में ही नेशनल वाटरवे द्वारा की डीपीआर बनाने के लिए ठेकों का निमंत्रण जारी कर दिया गया, विश्व बैंक से लोन लिया और आज इस पर तेजी से कार्य हो रहा है।





 

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