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गांधी के सपनों का राजस्थान बनाओ?

Thursday, February 07, 2019 10:05 AM

डॉ.एस.एन. सुब्बाराव

भाईजी के प्रिय संबोधन से देश और दुनिया के लाखों लोगों के प्रेरणा स्रोत डॉ.एस.एन. सुब्बाराव में लोग आज के विषम दौर में भी गांधीवाद की एक नई संकल्पना का साक्षात्कार करते हैं। सत्य तथा न्याय पर आधारित विश्व की स्थापना के लिए आजीवन समर्पित भाईजी 1942 में अपनी 13 वर्ष की उम्र में ही भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल यात्रा करनी पड़ी थी। 7 फरवर 1929 को बैंगलोर में जन्मे भाईजी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी से प्रभावित हुए। आजादी की लड़ाई के दौरान देश के सुविख्यात नेता डॉ.एन.एस. हार्डीकर के नेतृत्व में हिन्दुस्तानी सेवा दल के माध्यम से युवाओं के प्रशिक्षणों की श्रृंखला बनाई।

फिर कांग्र्रेस के अनेक राष्ट्रीय नेताओं के आग्र्रह पर घर-परिवार के मायामोह से मुक्त होकर भाईजी कांग्र्रेस सेवा दल से जुड़े और राष्ट्र निर्माण में जुड़ गए। संविधान में सभी स्थापित 22 भाषाओं के ज्ञाता भाईजी, फिर गीत-संगीत और सर्वधर्म प्रार्थनाओं द्वारा लोगों को प्रेरित करने लगे तथा 1951 से 1969 तक कांग्र्रेस सेवा दल के माध्यम से लोगों को अनेकता में एकता ये हिन्द की विशेषता समझाते रहे। जवाहर लाल नेहरू, आर.आर. दिवाकर, मौलाना आजाद, के. कामराज और लाल बहादुर शास्त्री के निकट रहकर भी सत्ता व्यवस्था से दूर रहकर सेवा की राजनीति में कूदे तथा स्थापना के अभियान को लेकर गांधी शांति प्रतिष्ठान के आजीवन सदस्य रहे भाईजी, उस समय के सर्वाधिक हिंसा ग्रस्त क्षेत्र चंबल घाटी में जाकर बस गए।

आप याद करें तब 1969 में भाईजी द्वारा स्थापित महात्मा गांधी सेवा आश्रम ‘जोरा’ (मध्यप्रदेश) में ही, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण का हिंसा चंबल के बीहड़ों से 654 बागियों (डाकुओं) ने समर्पण किया था। प्रसंगवश कहना चाहूंगा कि तब बचपन में मैंने भी सुब्बाराव जी का नाम पहली बार सुना था। 1947 में भारत की आजादी के बाद डॉ. सुब्बाराव ने देश की इस अहिंसक क्रांति को आगे बढ़ाते हुए 1970 में राष्ट्रीय युवा योजना स्थापित की और युवा शिविरों के माध्यम से लाखों युवाओं को प्रशिक्षित कर भारत में रचनात्मक आंदोलन की पृष्ठभूमि बनाई जो साम्प्रदायिक दंगे, तूफान, भूकंप, बाढ़, आतंकवाद, गरीबी, सामंती हिंसा, भ्रष्टाचार, जातिवाद और ऐसी ही मानवीय तथा प्राकृतिक आपदाओं में शांति के सिपाही युवाओं की देश सेवा को कारगर बनाती हैं।

हमारे गांधीवादी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी सुब्बाराव जी की युवाओं की रचनात्मक राजनीति और प्रशिक्षण का कभी हिस्सा रहे हैं। अत: हमें राष्ट्रीय एकता अभियान के प्रति राजस्थान में ‘राज्य एकता परिषद’ का गठन कर भाईजी के शांति, एकता और सद्भाव के आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहिए।डॉ.एस.एन. सुब्बाराव उर्फ भाईजी, इस तरह आज 91 वर्ष की उम्र में भी सक्रिय और स्वस्थ्य रहते हुए देश और दुनिया में शांति, न्याय और एकता की अलख जगा रहे हैं तो सही मायनों में महात्मा गांधी की जीवन प्रेरणा को आगे बढ़ा रहे हैं। भाईजी का व्यक्तित्व और कृतित्व शांति और समता का प्राकृतिक स्वरूप है तथा राष्ट्रीय सेवा योजना का वर्तमान आंदोलन इनकी ही परिकल्पना है जो एनसीसी की तरह युवाओं में एनएसएस के रूप में जानी जाती है।

राष्ट्रीय एकता परिषद, नेहरू युवा केन्द्र, सर्व सेवा संघ, शांति सेना, कस्तूरबा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट, सेवाग्र्राम आश्रम, इण्डियन कमेटी आॅफ यूथ आर्गेनाइजेशन जैसी अनेक गांधी प्रेरित संस्थाओं से जुड़े रहे भाईजी, मुझे आज भी महात्मा गांधी के सच्चे सिपाही लगते हैं। मैं सोचता हूं कि आज की संस्थाओं, संगठनों और राजनैतिक दलों की संकीर्णता के दुष्परिणामों को देखते हुए सत्ता, सम्पत्ति और प्रचार-प्रसार से मुक्त रहकर सुब्बाराव जी हम सबको 2019 में भी जन सेवा का नया पाठ पढ़ा रहे हैं। शायद इसीलिए सभी लोग इन्हें आज का गांधी भी कहते हैं।

भाईजी के राजस्थान में भी हजारों प्रशंसक और अनुयायी हैं तथा यहां इन्होंने सैकड़ों गांधीवादी संस्थाओं, संगठनों तथा व्यक्तियों को गांधी जीवन दर्शन से प्रभावित भी किया है। इसलिए मैं भी जयपुर में उनके 91 वर्ष में प्रवेश पर अभिनंदन करते हुए कहना चाहता हूं कि राजस्थान में गांधी जी के जीवन दर्शन का सपना अब फिर से सक्रिय और सशक्त बनाया जाना चाहिए क्योंकि वर्तमान की सत्ता-राजनीति में गांधीवादी मूल्य तथा संस्थान और व्यक्ति सबसे अधिक संकट में है। महात्मा गांधी आज होते तो 150 वर्ष के होते और सुब्बाराव जी आज हैं तो 91 वर्ष के हैं।

लेकिन इनके बाद का नया भारत क्या था, क्या हो गया और क्या होगा अभी? हमें इस पर मिलकर विचार करना चाहिए क्योंकि भारत का लोकतंत्र गांधी जी और सुब्बाराव जी के सपनों के ठीक विपरीत चल रहा है तथा जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीयता की विघटनकारी हिंसा में जल रहा है। मैं खुद भी गांधी के जीवन को ही मेरा दर्शन मानता हूं और अनुभव करता हूं कि गांधी के अलावा अब कोई दूसरा सूत्र, हमारे इस नए भारत को जोड़ने वाला और युवाओं को प्रेरित करने वाला नहीं है। अत: कम से कम राजस्थान को गांधी पाठशाला की तरह विकसित और रचनात्मक बनाने का काम हमें करना चाहिए और ‘सत्ता’ की राजनीति के समानान्तर सेवा की राजनीति को महत्व देना चाहिए।

हमें भाईजी सुब्बाराव जी के सानिध्य में अपने आप से ये सवाल भी पूछना चाहिए कि आज सरकार, बाजार और जीवन व्यवहार में गांधी जी क्यों भूला दिए गए हैं तो जाति-धर्म की राजनीति गांधी जी को लगाकार क्यों अपमानित कर रही है? भाईजी के अभिनंदन की प्रासंगिकता आज यही है कि युवा भारत को हम एक बार फिर एकजुट होकर रचनात्मक विकास की मुख्य धारा में लाएं और देश के 135 करोड़ भारतवासियों को भारत जोड़ो का सपना बनाएं। सद्भाव और सहिष्णुता को लोकतंत्र का आधार बनाएं और नए राजस्थान की कोई आदर्श अवधारणा स्थापित करें। संयोग से अशोक गहलोत का तीसरी बार मुख्यमंत्री बनना भी गांधी विचार की प्रयोगशाला तैयार करने में सहायक बन सकता है।    
 

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