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जानिए राज काज में क्या है खास

Monday, December 10, 2018 09:55 AM

जवाब नहीं पंडितों का
सूबे के पंडितों का भी कोई जवाब नहीं है, जब देखो, जहां देखो पंचांग खोलकर बैठ जाते हैं। वे न तो स्थान देखते है और नहीं समय। तीये की बैठक तक में शादी का मुहूर्त निकाल देते हैं। अब देखो ना संडे की दोपहर सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने के सामने टी-स्टाल पर भी शपथ लेने का मुहूर्त निकाल दिया। पुरानी बस्ती वाले पंडितजी ने तो 17 तारीख को शाम चार बजे के समय को मेष राशि वालों के लिए शुभ बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भगवा वाले भाई लोगों के चेहरे एकबारगी तो खिल गए, मगर पंडितजी ने ज्योहीं राशि का नाम बताया, तो उनको बिना दक्षिणा दिए ही रवाना कर दिया। बेचारे पंडितजी को यह थोड़े पता था कि वह जो कुछ बोल रहा है, उसकी वाणी के लिए यह जगह उचित नहीं है।

चर्चा जूते और नेताओं की!
आजकल नेताओं के साथ जूते भी चर्चाओं में हैं। जनता का जूता कब किस नेता पर खुल जाए, यह पता नहीं चल पाता। जूते का असर इक्कीसवीं सदी के नेताओं पर कितना पड़ता है, यह तो कहा नहीं जा सकता। लेकिन जूता बनाने वाली कंपनियों की कमाई पर इसका जरूर असर पड़ता है। कंपनी वाले पेटेंट कराने के लिए दौड़धूप भी करते हैं। जूते-जूते में फर्क होता है। नेता जब आपस में शब्द बाणों से एक दूसरे पर जूते मार रहे हैं, तो जनता अब हकीकत में उठाने लगी है। जूते उठाने या फिर फेंकने की परम्परा नई नहीं है। यह सिलसिला प्रथम विश्व युद्ध से ही शुरू हो गया था। उस समय जनता ने राजा- महाराजाओं के खिलाफ जूता उठाया तो उनको राज छोड़ना ही पड़ा। अब नेताओं पर सरे आम जूते फेंके जा रहे हैं। राज करने वालों में चर्चा है कि आने वाले समय में जो नेता ज्यादा जूते खाएगा, वो सबसे अच्छा राजनेता साबित होगा। चूंकि जनता इतनी सयानी है कि वह नेताओं के लखणों के आधार पर ही जूता मारेगी।

कॉन्फिडेंस बनाम ओवर कॉन्फिडेंस
सूबे में पब्लिक को जो कुछ करना था,उसने सात तारीख को ही कर दिया। पब्लिक ने जो कुछ किया वो तो मंगल को दंगल करेगा, लेकिन नेताओं में कॉन्फिडेंस और ओवर कॉन्फिडेंस अभी भी हावी है। राज का काज करने वाले भी दिन रात जोड़-बाकी और गुणा-भाग में जुटे हैं। अब देखो ना एक्जिट पोल के बाद भी मैडम का कॉन्फिडेंस कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। जोधपुर वाले भाईसाहब भी बड़े जॉली मूड में है। छोटे पायलट साहब का भी चेहरा खिला हुआ है। इस तिगड़ी के चलते सूबे के ब्यूरोक्रेट्स  कन्फ्यूज्ड हैं। बेचारे वे खुलकर न तो जोधपुर वाले भाईसाहब को बधाई दे पा रहे हैं और नहीं पायलट साहब की हाजरी भर पा रहे हैं।

एक जुमला यह भी
सूबे में तीन दिनों से एक जुमला जारी है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि एक महीने तक चले चुनावी माहौल को लेकर है। सोशल मीडिया वाले तो एक कदम आगे निकले। अब देखो ना सोशल मीडिया पर दो दिन से एक जुमला दिन-रात चल रहा है। जुमला है कि चमचे गायब, गमछे गायब, लाखों के रोजगार गए। भंडारे सब खत्म हुए, और देव सभी सुरधाम गए। मदिरा आवंटन से उपजा, भ्रम क्लेश सब दूर हुआ। खत्म हुआ मतदान, दर्प और अहम बहुत कुछ, चूर हुआ। परिणामों के गुणा-भाग की, माथापच्ची जारी है। जीते चाहे जो भी लेकिन, हरदम जनता हारी है।   

- एल.एल शर्मा

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