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हुंकार हिंदुत्व की

Wednesday, December 05, 2018 09:55 AM

अतक भी हिंदू और हिंदुत्व के मुद्दे से पिंड नहीं छूट रहा राजनीति का। खासकर चुनावी मैदान में। हिंदुत्व को लेकर नए-नए अध्याय खंगाले जा रहे हैं। विद्वानों से लेकर राजनीतिज्ञों के बीच चल रहे हैं अभी भी तर्क-वितर्कों के दौर-दौरे। एक दूसरे के ‘स्थूल-ज्ञान’ से लेकर ‘सूक्ष्म-ज्ञान’ को टटोला जा रहा है। बाकायदा सोमनाथ से लेकर श्रीराम तक के मुद्दों को छुआ जा रहा है। आजादी से पहले और आजादी के बाद तक की छिपी राजनीतिक कहानियां भी खोलकर सुनाई जा रही हैं।

यह भी सत्य है कि जहां-जहां रामजी का जिक्र छिड़ेगा, वहां-वहां हनुमानजी यानी बजरंगी-बली की भी चर्चा होगी ही, होगी। आखिर रामचरित मानस में खुद हनुमानजी ने भी तो अपने श्रीमुख से यह बोला था-‘रामकाज कीन्हें बिनु, मोहि कहां विश्राम’। वहीं शिवजी का जिक्र भी होता है। खुद भगवान राम ने कहा था कि  ‘शिवद्रोही मम दास कहावा, सो नर मोहि सपनेहुं नहिं भावा’। यह प्रसंग सिर्फ कथा-प्रवचनों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि चुनावी माहौल में भी गाहे-बगाहे हो ही जाता है। अब आप ही देखें, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधीजी के श्रीमुख से मोदीजी के हिंदुत्व के ज्ञान पर सवाल क्या उठा, मोदीजी ने राजनीतिक कहानी के साथ यूपीए सरकार के उच्चतम अदालत में पेश किए तथ्यों को सामने ला दिया।

जोधपुर की मीठी बोली की तारीफ करते हुए बोल पड़े यहां तो बिच्छू को भी बिच्छूजी कहकर संबोधित किया जाता है। शौर्य के तो कहने ही क्या? मेरे हिंदुत्व के कम ज्ञान पर नामधारी सवाल उठा रहे हैं। मैं स्वीकार करता हूं कि मेरे में भले ही कम ज्ञान हो, लेकिन हिंदुत्व और हिंदू धर्म हिमालय से भी उूंचा और समुद्र की गहराइयों से भी असीम गहरा है। ऋषि-मुनि इस पर पूर्ण ज्ञान का दावा नहीं करते, लेकिन नामधारी करते हैं। जनता-जनार्दन से पूछा, क्या आप मेरे कम ज्ञान के आधार पर वोट डालेंगे? आजादी के बाद एक राजनीतिक कहानी के पन्ने खोले।

सरदार पटेल ने जब सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प लिया था, तब देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को रोका था? इस परिवार के लोग हमें हिंदुत्व का पाठ पढ़ाएंगे? इनकी यूपीए सरकार ने तो राम को मात्र काल्पनिक बताते हुए कहा था कि इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। पूर्व में प्रदेश के चुनावी दौरे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बजरंग-बली का महिमा गान कर ही चुके थे। तभी राज्य-मंत्रणा के मंच पर एक विशेषज्ञ हिंदू और हिंदुत्व पर स्वामी विवेकानंद के इस कथन को ढूंढ लाए। बताया-‘मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं, जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति, दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता से ही विश्वास नहीं करते, वरन् समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते है’।

उनकी शिष्या भगिनी निवेदिता ने भी कहा था-‘सनातन धर्म, ज्ञान प्राप्त करने के सच्चे प्रयास के प्रत्येक रूप की अनुमति देता है और उसे स्वीकार करता है। वह सत्य के किसी रूप से न ईर्ष्या करता है, न उस पर संदेह। संभवत: इसीमें हिंदू धर्म का यथार्थ गौरव है’। कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी ‘भारत-भारती’ रचना में लिखा है-
सबसे हमारे धर्म का ऊंचा यही तो लक्ष है,
होती असीम अनेकता में एकता प्रत्यक्ष है।
मति की चरमता या परमता है वही अविभिन्नता,
बस छा रही सर्वत्र प्रभु की एक निरवच्छिन्नता।

- महेश चन्द्र शर्मा

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