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लोकतंत्र में धार्मिक आस्थाओं का खेल

Thursday, October 25, 2018 08:35 AM

विकास और परिवर्तन के इस दौर में हमारी विडंबना, विरोधाभास और विसंगतियों का ऐसा घमासान मचा हुआ है कि हम स्वभाव से तो बदल रहे हैं लेकिन अपनी आस्थाओं, परम्पराओं और मान्यताओं से पीछे नहीं छुड़ा पा रहे हैं। हमारा अतीत हमारे वर्तमान को ग्र्रहण की तरह सता रहा है। 21वीं शताब्दी इस तरह हमारे विगत इतिहास से अभिशापित है कि वो आगे भी बढ़ना चाहती है लेकिन बार-बार पीछे मुड़कर देखने के लिए लाचार भी है। यानि कि एक साथ तीन पीढ़ियां अपनी पहचान बचाने के लिए अब चौथी पीढ़ी को अंधकार में धकेल रही है।हम सत्य के उपासक हैं लेकिन दुराचरण के भी गुलाम हैं। हम भगवान में आस्था रखते हैं लेकिन मनुष्य का सम्मान नहीं करते हैं।

हम धर्म की पताका फहराते हैं लेकिन अधर्म से जीवन के सभी सुख भोगते हैं। हम राम और कृष्ण तो बनना चाहते हैं लेकिन सीता और द्रोपदी की व्यथा-कथा नहीं समझना चाहते हैं। हम हजारों साल से गुलामी के विरुद्ध लड़ तो रहे हैं, लेकिन आजादी के संविधान को कभी स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। हमारे मन में विकास की अपार इच्छाएं हैं लेकिन हम परिवर्तन में भी रात दिन वास्तुदोष ढूंढ़ते रहते हैं और हम योग की पूंछ पकड़कर भोग की वैतरणी भी पार करना चाहते हैं। इसी तरह हमारी भारतीयता अब एक खण्ड-खण्ड पाखण्ड पर्व हो गई है और हमारी हालत ये बन गई है कि हम अपने घर में धर्म और जाति की, अपराध और तानाशाही की आग लगाकर दुनिया में शांति और अहिंसा के अलमबरदार भी बनना चाहते हैं।

भारत का ये अशांत वर्तमान इसीलिए भी आज इतनी हिंसा और गैर बराबरी से भरा हुआ है कि हम अपने लोकतंत्र, संविधान और आजादी को रात दिन अपमानित और अस्थिर भी कर रहे हैं। हमारी दुर्दशा का ये आलम है कि आजादी के 70 साल बाद भी हमारा अपना जन प्रतिनिधि ही संसद से लेकर सड़क तक और राजपथ से लेकर जनपथ तक हिन्दू- मुस्लमान और जाति- धर्म की राजनीति कर रहा है तो गरीबी और शोषित-पीड़ित भारत-भारती का चीर हरण भी कर रहा है तो धन बल, भुज बल और सत्ता बल के साथ शाम, दाम, दण्ड, भेद से रावण के पुतले जलाकर भी रामराज्य की आरती भी वार कर रहा है।

यही तो हमारी आस्था और परम्परा की रामायण और महाभारत है कि हम आज भी सुदामा और शबरी से नफरत कर रहे हैं और अहिल्या और शूर्पनखां की मजाक उड़ा रहे हैं तथा भारत की युवा पीढ़ी को बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई के चक्रव्यूह में जाति, धर्म और राष्ट्रवाद की अंधी तलवारें चलाकर मार रहे हैं तो दुनिया में मनुष्य के विकास की सूची में 115वीं सीढ़ी पर बैठे हैं और अपनी मां-बहनों को मंदिर तक में घुसने से रोक रहे हैं। हमें आश्चर्य होता है कि दुनिया में 5 हजार साल पुरानी इस भारत की सहिष्णुता भरी सभ्यता और संस्कृति को हम कुछ इस तरह असभ्य और बीमार बना रहे हैं कि आस्था की राजनीति को लोकतंत्र का हथियार बनाकर साधु के भेष में ठगों का साम्राज्य स्थापित कर रहे हैं।

अयोध्या से लेकर शबरी तक और भारत माता से लेकर गाय, गंगा और गीता माता तक तथा पुलिस से लेकर फौज तक और ग्र्रामसभा से लेकर लोकसभा तक हम गांधी, आम्बेडकर और सुभाष चन्द्र बोस की स्वाधीनता, समानता और आजादी की लड़ाई को भी अपनी राजनीति का दाना-पानी समझकर नेहरू और पटेल को लड़ा रहे हैं। ये ही नए भारत की आज मूल समस्या है कि हम आस्था के हाथी को राजनीति की अफीम पिलाकर लोकतंत्र और आजादी का गला घोट रहे हैं। ये विरोधाभास ही है कि हम विकास के नारे लगाकर भी भारत के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को रोक रहे हैं।

ये हमारी राजनीति का ऐसा खेल है कि हम सरकारें बदलकर भी चुनाव सुधार नहीं कर रहे हैं, पुलिस सुधार नहीं कर रहे हैं, देश की कोई शिक्षा नीति नहीं बना पा रहे हैं और विकास का अपना कोई भारतीय मॉडल भी तय नहीं कर पा रहे हैं। हम आज तक ये नहीं बता पा रहे हैं कि अन्नदाता किसान क्यों आत्म हत्याएं कर रहे हैं? कालाधन क्यों चुनावों की प्राणवायु बना हुआ है? अपराधियों को संसद और विधानसभाओं में क्यों घुसने दिए जा रहा है तो भारत में संविधान और न्यायपालिका को लगातार महत्वहीन क्यों बनाया जा रहा है। हम ये तक नहीं जानना चाहते कि जैसे-जैसे विकास हो रहा है देश में वैसे-वैसे अमीर क्यों बढ़ रहे हैं और गरीब- बात-बात पर क्यों लड़ झगड़कर मर रहे हैं।

मेरे 135 करोड़ देशवासियों को इसीलिए आज ये सोचना पड़ेगा कि केवल चुनाव से ही लोकतंत्र और आजादी सुरक्षित नहीं होगी, क्योंकि चुनावों में अब आस्था और परम्परा की आंधियां चल रही हैं और नोट, शराब और जाति- धर्म की कुटिलताओं के सौदागर अच्छे दिनों के सपने बेच रहे हैं और इस महाभारत को हर हाल में जीतने के लिए किसी अश्वत्थामा के मरने की झूंठी घोषणाएं भी की जा रही है। ये समय है कि हम अपनी दोहरी मानसिकताओं को बदलें अन्यथा ये होगा कि गैर बराबरी की व्यवस्था भारत के लोकतंत्र में कभी नहीं बदलेगी और कर्ण का रथ महाभारत के कीचड़ में फंसता ही चला जाएगा।

अत: आस्था की धार्मिक और जातीय परम्पराओं को छोड़कर अब लोकतंत्र और संविधान की आजादी को बचाइए क्योंकि ये 21वीं शताब्दी का भारत में हिंसा और असत्य से पीड़ित है।
 

-वेदव्यास

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