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अपने हो या पराये सबके लिए हो न्याय

Tuesday, September 11, 2018 15:40 PM

उच्चतम न्यायालय (फाइल फोटो)

लोकमान्य शायर ‘महबूब खजा’ का शेर ‘मंजिले सुबह आ गई शायद, रास्ते हर तरफ को जाने लगे’ इन दिनों हुए न्यायपालिका के कुछ निर्णयों पर सटीक उतरता है। इसमें सबसे अहम निर्णय उच्चतम न्यायालय द्वारा मलयाली साहित्यकार एस. हरीश के उपन्यास ‘मीशा’ पर रोक लगाने से इन्कार का है।

इस उपन्यास के कुछ अंश ब्राह्मण पुजारियों द्वारा हिन्दु महिलाओं के साथ यौनिक संबंधों के अंतर्भाव को लेकर हैं एवं इसमें कहा गया है कि नहाकर मंदिर जाना एवं मासिक धर्म के समय मंदिर न जाने का एक कारण कुछ मंदिरों में पुजारियों की हवस भी रही है।

इस उपन्यास के कुछ अंश सबसे पहले ‘मातृभूमि’ समाचार-पत्र में छपे थे लेकिन तीन अंशों के प्रकाशन के पश्चात इतना बवाल हुआ कि इन अंशों का प्रकाशन रोकना पड़ा, जनहित याचिका दायर हुई एवं कुछ समय के लिए बवाल शांत हुआ। जनहित याचिका में उच्चतम न्यायालय ने उपन्यास के विवादास्पद अंश हटाने की याचिका खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी साहित्यकार को हक है कि वह सन्दर्भवश अपनी कल्पना को बहुआयामी विस्तार दे क्योंकि अगर कल्पना का विस्तार, तथ्यों का लेखन रूक गया तो रचनात्मकता दम तोड़ देगी।

सृजन स्वतन्त्रता , स्वायतता की पृष्ठभूमि में ही पल्लवित होता है। मानवी चिंतन के चेतन, अवचेतन सभी पहलू जब तक रेचित नहीं होते, मानवी मन का अग्रिम अनुसंधान दुष्कर होगा। स्वायतत्ता समाज सुधार का प्रथम सोपान है।
आज सती प्रथा,  दहेज , देवदासी प्रथा , घूंघट , स्त्री नौकरी नहीं करेगी जैसी कुप्रथाएं इसीलिए समाप्त हुई हैं क्योंकि तात्कालीन लेखकों ने इनके विरूद्ध खुलकर लिखा एवं इससे जन जागृति भी हुई।

दिवराला काण्ड में रूपकंवर के सती होने के विरूद्ध लेखकों ने विश्व चेतना का निर्माण किया एवं यही कारण है कि एक वर्ग के घोर विरोध के बावजूद यह प्रथा नेस्तनाबूद हो गई। कभी किलों, प्राचीरों आदि के निर्माण में नर बलि आम थी एवं बहुधा इसका शिकार अति निर्धन, छोटी जातियों के लोग होते थे। यह तात्कालीन लेखकों एवं समाज सुधारकों का ही कमाल था कि यह प्रथा समाप्त हुई। अगर नर बलि होनी है तो श्रेष्ठतम सुवर्ण की क्यों नहीं लेकिन इस संसार में कटता वही है जिसे काटा जा सकता है।

किसी भी उपन्यास में संदर्भ महत्वपूर्ण होते हैं, पात्र उन्हीं का अनुसरण करते हैं एवं इसीलिए उपन्यास के कोई अंश आम नहीं होते, इसमें वर्णित तथ्यों, समय, काल तथा परिस्थितियों एवं पात्रों के अनुरूप होते हैं। ’ कुमारसंभव ’ में काव्यपुरोधा कालीदास के यह अंश कितने अद्भुत, साहित्यिक सौन्दर्य का चरम है जहां पार्वती की सखियां उसे सुहागरात पूर्व कहती हैं।

कि उमा! जब शिव संभोग के पूर्व तुम्हारी टांगे कंधे पर रखे तो तुम अंगूठे से उनके जूडे के पीछे अवस्थित चन्द्रमा को छेड़ देना, तब मन का अधिष्ठाता चन्द्र उन्हें उन्मत्त कर ऐसे प्रणय दृश्य उपस्थित करेगा जिनका सुख इस जड़-जगत में दुर्लभ है। यह सौन्दर्य, ज्ञान, ज्योतिष का चरम नहीं तो और क्या है?

आज हम अधिनायक दौर में नहीं लोकतंत्र में रहते हैं एवं निश्चय ही हर लेखक, कलमकार, साहित्यकार को अभिव्यक्ति, विचारों के आदान-प्रदान की पूरी स्वतंत्रता है। अगर यह आजादी छीन ली गई तो तंत्र निरंकुश हो उठेगा। अगर मैं वही कहूं जो आप चाहते हैं तो भावनाओं, चिंतन की निर्बाध सलिला का प्रवाह रूक जाएगा एवं रूका हुआ पानी सड़ांध ही पैदा करेगा। कुछ समय पूर्व लेखकों की हत्या दर हत्याओं ने देश में ऐसा माहौल बना दिया मानो कलम मौन हो गई हो। कुछ लेखकों विशेषत: स्तंभकारों ने मुझे फोन कर कहा कि क्या हम लिखें भी, क्या पता कल हम न रहें?

आज विकसित लोकतंत्रों में मानवी स्वतंत्रता ने ही उनके विकास के द्वार खोले हैं। आज वर्ण व्यवस्था लगभग समाप्ति की ओर है, क्यों? इसका सीधा कारण है इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के विरूद्ध बहुत लिखा गया। नियोगप्रथा, देवदासी प्रथाएं क्यों कालकवलित हुई क्योंकि इन पर कहा गया, लिखा गया। यह प्रथाएं तात्कालीन समय में वर्ग विशेष की हवस, यौनिक तुष्टि का बहाना नहीं तो और क्या थी? लिखा जाएगा तो पढ़ा जाएगा, पढ़ा जाएगा तो चिंतन बनेगा एवं यह चिन्तन का उजाला ही अंतत: जातिवाद एवं अन्य कुप्रथाओं का अंधेरा नष्ट करेगा। रोशनी है पर उसे प्रकट करने वाला कोई साहित्य-भट तो हो। लोकतंत्र एवं निरंकुश तंत्र में भेद तभी बनेगा।

इसी कड़ी में मुख्यमंत्री राजे की गौरव-यात्रा पर हाईकोर्ट का निर्णय मील का पत्थर ही नहीं दूर की गोटी भी है कि इस यात्रा पर सरकारी पैसा खर्च नहीं होगा। मुख्यमंत्री की चुनावी यात्रा पर पार्टी खर्च करे, इसका बोझ सरकार क्यों भरें? सरकारी माल पर यह चुनावी नृत्य कैसा? बिजली स्वयं पर गिरे तो बिजली नहीं तो कौतुक ही कहिये लेकिन न्यायाधीश महोदय शायद भूल गए कि इस प्रभार की बिजली अब महाजनों, व्यवसायियों पर गिरेंगी, इसे वहन तो जनता अथवा इसका एक वर्ग ही करेगा फिर भी यह निर्णय एक नजीर है कि राजनेता अपना चुनावी प्रभार सरकारी तिजोरियों पर क्यों डालते हैं?

न्यायपालिका के गत दिनों हुए दो और निर्णय भी सराहनीय है। इनमें एक सड़कों पर गड्ढे एवं आवारा पशुओं को हटाने से संबंध है। इन दिनों जाने शहर की सड़कों को क्या हो गया है? जगह-जगह नालियां अटी हैं एवं ऐसे जानलेवा गड्ढे बन गए हैं कि हर वक्त आशंका बनी रहती है। अभी मैं मेरी कार ड्राइव कर जोधपुर से वाया पाली जयपुर गया तो सड़क पर जगह-जगह आवारा पशु विशेषत: गायें घूम रही थीं।

यह आलम तो नेशनल हाईवेज का है जहां आए दिन इसके चलते दुर्घटनाएं आम हैं। यह प्रशासकीय लापरवाही नहीं तो और क्या है? मॉबलीचिंग के भय से संभवत: लोगों ने इन पशुओं का सुरक्षित स्थानों पर आदान-प्रदान बंद कर दिया है। अंतिम निर्णय मद्रास हाईकोर्ट कोर्ट का टॉलटैक्स से संबंध है जहां वीआईपीज एवं मौजूदा न्यायाधीशों के लिए अलग लेन बनाने की बात की गई है।

इस निर्णय ने टॉलटैक्स पर लगने वाले समय से आम आदमी की व्यथा की ओर ध्यान आकर्षित किया है पर हुजूर! कुछ उनका भी ध्यान रख लेते जो वीआईपी नहीं हैं। जोधपुर से जयपुर जाते हुए मुझे चार टॉलप्लाजों पर टैक्स देना पड़ा एवं कुल पचास मिनट बर्बाद हुए। शकील बदायूनी के एक गीत की पंक्तियां ’ अपने हो या पराये सबके लिए हो न्याय’ यहां प्रसांगिक है।
 

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