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ईवीएम पर विवाद अनुचित

Saturday, February 09, 2019 09:50 AM

ईवीएम पर मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने जितना कड़ा वक्तव्य दिया है उससे पता चलता है कि इस पर विवाद पैदा किए जाने को लेकर चुनाव आयोग के अंदर कितनी पीड़ा और क्षोभ है। अरोड़ा ने स्पष्ट कर दिया है कि ईवीएम बिल्कुल परीक्षित और सुरक्षित तथा सफल है, इसको कतई बदला नहीं जाएगा। यह भारत देश है जहां एक हैकर लंदन के एक कार्यक्रम में अमेरिका से मुंह ढंके हुए दावा करता है कि चुनावों में ईवीएम की हैकिंग बड़े पैमाने पर होती है और हमारे यहां उस पर हंगामा मच जाता है। हैकर सैयद शुजा ने 2014 के आम चुनाव में बड़े पैमाने पर हैकिंग का दावा करते हुए यह भी कह दिया कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान चुनावों में उसने हैकिंग को नाकाम कर दिया।

उसने आम आदमी पार्टी से लेकर सपा, बसपा सब पर हैकिंग के लिए संपर्क करने का आरोप लगा दिया है। इन सबका क्या अर्थ है? लंदन में यह हैकथॉन कार्यक्रम इंडियन जर्नलिस्ट एसोसिएशन द्वारा आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की मौजूदगी तो प्रश्नों के घेरे में है ही। वैसे आयोजकों का दावा है कि उन्होंने सभी दलों को आमंत्रित किया था, चुनाव आयोग को भी। इस संगठन ने पिछले वर्ष पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के पूर्व अगस्त 2018 में भी लंदन में एक कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसमें राहुल गांधी शामिल हुए थे। मूल प्रश्न यह है कि क्या एक हैकर का दावा स्वीकार कर आम चुनाव के पहले ईवीएम पर हमें घमासान करना चाहिए? चुनाव आयोग ने शुजा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा दिया है। उसे पकड़कर भारत लाया जाए ताकि पता चल सके कि उसके पीछे कौन सी शक्तियां हैं।

मान लें कि ईवीएम में गड़बड़ी हो सकती है। किंतु, ऐसा करने के लिए भारतीय चुनाव आयोग, राज्यों के चुनाव आयोग, ऊपर से नीचे तक का पूरा प्रशासन, हजारों की संख्या में ऐसा करने वाले विशेषज्ञ चाहिए। हर क्षेत्र में उम्मीदवार अलग होते हैं और उसी अनुसार ईवीएम में बटन बनाए जाते हैं। तो प्रत्येक क्षेत्र में गड़बड़ी के लिए आपको अलग टीम चाहिए। इतने व्यापक पैमाने पर धांधली संभव है क्या? वस्तुत: यह एक प्रश्न सारे आरोपों पर भारी पड़ता है। जहां तक हैकिंग का प्रश्न है तो न यह इंटरनेट से जुड़ा होता है और न ही अन्य मशीन से कि इसे हैक किया जाए या आनलाइन दूसरी गड़बड़ियां पैदा की जा सके। यहां ईवीएम की तकनीक और प्रक्रिया का भी उल्लेख आवश्यक है।

इसमें वन टाइम प्रोग्रामेबल चिप होता है। इसके संचालन के लिए वाईफाई और किसी कनेक्शन की आवश्यकता नहीं। ईवीएम का सॉफ्टवेयर कोड वन टाइम प्रोग्रामेबल नॉन वोलेटाइल मेमोरी के आधार पर बना है। निर्माता से बगैर कोड हासिल किए छेड़छाड़ हो ही नहीं सकती। ईवीएम में एक कंट्रोल यूनिट, बैलेट यूनिट और पांच मीटर केबल होता है। कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होता है व बैलेटिंग यूनिट वोटिंग कम्पार्टमेंट के अंदर रखा होता है। कंट्रोल यूनिट के प्रभारी मतदान अधिकारी द्वारा बैलेट बटन दबाने के बाद ही मतदाता बैलेटिंग यूनिट पर उम्मीदवार एवं चुनाव चिन्ह के सामने बटन दबाकर मत डाल पाता बनाता है। मतदान अधिकारी मतपत्र को कंट्रोल यूनिट के साथ जोड़ेगा नहीं तो वोट नहीं हो सकता।

अब मतदान प्रक्रिया और अन्य व्यवस्थाओं पर नजर दौड़ाइए। ईवीएम मशीन की कौन सी सीरीज किस मतदान केन्द्र पर होगी इसका पता मतदान कराने वाले दल को एक दिन पहले चलता है। मतदान आरंभ होने से पहले ईवीएम के हर पहलू की जांच की जाती है। सभी उम्मीदवारों के उपस्थित पोलिंग एजेंटों की सहमति के बाद ही मतदान आरंभ होता है। मतदान आरंभ करने के पहले मॉक पोलिंग की प्रक्रिया भी संपन्न होती है। इसमें सभी पोलिंग एंजेट वोट डालते हैं जिससे यह पता चल जाता है कि उनके दबाए गए बटन से सही उम्मीदवार को वोट गया या नहीं। किसी मशीन में टेंपरिंग या अन्य गड़बड़ी होगी तो इससे पता चल जाएगा। हमारे देश की हालत यह है कि अगर कोई ईवीएम या वीवीपैट खराब हुआ और कुछ देर मतदान रुक गया तो भी उसे ईवीएम के साथ छेड़छाड़ बताने का हास्यास्पद तर्क दिया जाता है।

कोई मशीन नहीं जिसमें खराबी आए नहीं। खराबी आने पर उसे ठीक करने या तुरंत बदल देने की व्यवस्था होनी चाहिए। हर चुनाव में 20 से 25 प्रतिशत अतिरिक्त मशीनें सेक्टर अधिकारी की निगरानी में रखी जाती हैं, जिन्हें वह मशीनों के खराब होने पर बदलता है। प्रत्येक सेक्टर अधिकारी के क्षेत्राधिकार में लगभग दर्जन भर मतदान केन्द्र आते हैं। कई बार ईवीएम या वीवीपैट में संचालन करने वालों के भूल से कुछ समस्याएं पैदा होती हैं। कुछ देर में ठीक से संचालित होने लगता है किंतु तब तक हंगामा हो जाता है। कहने का तात्पर्य यह कि ईवीएम को निशाना बनाना निर्दोष को अपराधी बनाकर कठोर दंड देने के समान है। यह एक अपराध है जो राजनीतिक दल कर रहे हैं।

अगर ईवीएम पर थोड़ी भी शंका होगी तो चुनाव आयोग इसे बनाए रखने पर अड़ा क्यों रहेगा? पूरा चुनाव आयोग और वह भी 2001 से  राजनीतिक दलों के हाथों खेलेगा ऐसा मान लें तो कोई संस्था विश्वसनीय बचेगी ही नहीं। चुनाव आयोग ने कई बार राजनीतिक दलों या सामाजिक संगठनों एवं व्यक्तियों को आमंत्रित किया, चुनौती भी दी कि आकर इसे हैक करने या इसमें गड़बड़ी करने का प्रमाण दीजिए। कोई गया नहीं।

यह मामला अनेक उच्च न्यायालयों से लेकर उच्चतम न्यायालय गया और हर बार याचिकाकर्ताओं को मुंह की खानी पड़ी। उच्चतम न्यायालय 13 बार इस संबंध में अपना मत दे चुका है। पिछले वर्ष 23 नवंबर को ही मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने ईवीएम की जगह मतपत्रों से चुनाव कराने की याचिका खारिज करते हुए कहा कि हर व्यवस्था में संदेह की गुंजाइश रहती है।
- अवधेश कुमार
 

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