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खतरे में सीपीईसी का भविष्य

Thursday, October 11, 2018 07:30 AM

इमरान खान (फाइल फोटो)

चीन और पाक के लिए चीन-पाक आर्थिक कोरिडोर यानी सीपीईसी गले की हड्डी बन गई है अब ये दोनों देश अपनी इस परियोजना पर पचता रहे हैं और इससे बाहर आने के लिए दिन-प्रतिदिन नये हथकंडे अपना रहे हैं, नये ख्वाब दिखाए जा रहे हैं, तीसरे देशों को लालच दिखाया जा रहा है, लाभ की परियोजना बताने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। पर स्थिति यह है कि सीपीईसी परियोजना को लेकर कोई तीसरा देश न तो रूचि दिखा रहा है और न ही चीन-पाकिस्तान की इस परियोजना को लाभ की परियोजना समझने के लिए तैयार हैं।

तीसरे देशों की समझ यह है कि चीन का उपनिवेशवाद पाकिस्तान में ही दफन हो जाएगा, चीन ने अपने पड़ोसियों के धमकाने और पड़ोसियों की आर्थिक संसाधनों पर कब्जा जमाने की जो मानसिकताएं पाल रखी हैं वे सभी मानसिकताएं पाकिस्तान के अंदर में दफन होने वाली हैं। यह भी प्रश्न है जो परियोजना खुद विवादास्पद हो, जो परियोजना खुद अत्यंत खर्चीली हो गई हो, जो परियोजना खुद अलाभकारी परियोजना बन गई हो।

जिस परियोजना की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है, जिस परियोजना को लेकर हिंसा की बड़ी-बड़ी घटनाएं घटती हैं, जिस परियोजना को लेकर जन विरोध की स्थिति उत्पन्न है, जिस परियोजना को लेकर राजनीतिक रार भी खड़ा है, उस परियोजना को तीसरे देश लाभकारी और हितकारी कैसे समझेंगे?

नए प्रधानमंत्री इमरान खान की भी यह समझदारी बन गई है कि सीपीईसी को लेकर आंतरिक विसंगतियां दूर नहीं की जाएंगी, बलूचिस्तान की आबादी की आशंकाएं दूर नहीं की जा सकती है, बलूचिस्तान की आबादी को लाभ का हिस्सेदार नहीं बनाया जाएगा तो फिर यह परियोजना आत्मघाती साबित हो सकती है। बलूचिस्तान की आबादी को खुश करने के लिए नए सिरे ख्वाब दिखाए गए हैं, फिर भी बलूचिस्तान की आबादी का जन विरोध समाप्त नहीं हो रहा है।

चीन चाहता है कि पाकिस्तान की नई सरकार परियोजना को लेकर आंतरिक विसंगतियों का समाधान करे और परियोजना में लगे चीनी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। परियोजना की सुरक्षा में पाकिस्तान सेना के 15000 हजार जवान लगे हुए हैं। इमरान खान सरकार ने एक बयान दिया था कि सीपीईसी से सउदी अरब को जोड़ा जाएगा पर सउदी अरब ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। चीन चाहता था कि इस परियोजना के साथ ईरान भी जुडे पर ईरान पाकिस्तान की आतंकवादी नीति के कारण जुड़ने से इनकार कर दिया।

ईरान के अंदर में घटने वाली आतंकवादी घटनाओं में पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों की हिस्सेदारी से ईरान चिढ़ा हुआ है। ईरान पाकिस्तान के साथ कोई भी विकासात्मक कूटनीति को हितकारी नहीं मानता है। चीन ने सीपीईसी परियोजना को लेकर दुनिया को चकित कर दिया था, दुनिया भी भ्रमित हो गई थी, दुनिया यह समझ बैठी थी कि यह परियोजना सही में दुनिया के लिए लाभकारी है, चीन एक ऐसा आर्थिक गलियारा बनाने जा रहा है जो अमेरिका और यूरोप को न केवल आईना दिखाएगा बल्कि चीन अमेरिका और यूरोप से भी बड़ी शक्ति बन जाएगी।

चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग ने 2013 में इस परियोजना की घोषणा की थी। परियोजना की घोषणा करते हुए चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने कहा था कि पाकिस्तान के लिए यह परियोजना गेम चेंजर साबित होगी, दुनिया के लिए पाकिस्तान अब विकसित देश के रूप में सामने आएगा, पाकिस्तान की आर्थिक छवि बदल जाएगी, पाकिस्तान एशिया की सबसे बड़ी आर्थिक अर्थव्यवस्था वाला देश होगा। चीनी राष्ट्रपति की इस घोषणा को लेकर पाकिस्तान के शासक वर्ग बडे खुश थे।

पाकिस्तान में पहली बार कोई देश इतना बड़ा निवेश करने के लिए तैयार हुआ था। सीपीईसी परियोजना पर चीन ने 46 अरब डालर खर्च करने की घोषणा की थी। सिर्फ सड़क मार्ग ही नहीं बल्कि विकास की कई अन्य योजनाओं को भी गति देने की बात थी। सड़क, रेल और बंदरगाहों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाना था। चीन ने अपने व्यापारिक हितों के लिए पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह पहले से ही तैयार कर लिया था।

ग्वादर बंदरगाह का उपयोग चीन अब अपने व्यापारिक हितों के लिए कर रहा है। ढेर सारे प्रश्न चीन की इच्छा को लेकर है? आखिर चीन की सीपीईसी जैसी परियोजनाओं की इच्छा कैसे परवान चढी? आखिर चीन को सीपीईसी जैसी परियोजना की जरूरत क्यों और कैसे हुई? आखिर चीन इतना बड़ा निवेश करने के लिए कैसे तैयार हुआ है? क्या पाकिस्तान की आतंरिक कलह चीन को मालूम नहीं था, क्या पाकिस्तान की आतंकवादी कारखाने की जानकारी चीन को नहीं थी, क्या चीन यह नहीं जानता था कि पाकिस्तान एक असफल देश है?

वास्तव में चीन की खुशफहमी थी कि उसकी परियोजना को विश्व के अन्य देश हाथोहाथ ले लेंगे, विश्व के अन्य देश हिस्सेदारी करने के लिए बाध्य होंगे, चीन अपनी शर्तों पर विश्व के अन्य देशों को इस परियोजना में शामिल कर सकेगा? चीन की दो इच्छाएं प्रबल थीं। एक इच्छा यह थी कि इस परियोजना को हथकंडा बनाकर भारत को डराना और अमेरिका व यूरोप को चुनौती देना।

चीन की यह भी खुशफहमी थी कि वह इस परियोजना के माध्यम से अफ्रीका और यूरोपीय देशों के बाजार तक वह पहुंच बना सकता है।चीन को पहले अफ्रीका और यूरोप से व्यापार करने के लिए भारतीय महासागर क्षेत्र से गुजरना पड़ता था जो लंबा रास्ता तय करना पड़ता था, ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से अफ्रीका और यूरोप के देशों से सीधा व्यापार कर सकता है? अरब सागर से तेल व्यापार पर अमेरिकी सैनिक नजर रखते हैं जो चीन के लिए मुश्किल बात थी। ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से चीन अरब सागर में भी अपनी पैठ बनाना चाहता था।

चीन को बदलते भारत की पहचान नहीं थी। चीन को भारतीय सत्ता पर नरेन्द्र मोदी जैसे व्यक्ति के बैठने की कल्पना नहीं थी। चीन ने जब इस परियोजना की घोषणा की थी तब भारत में मनमोहन सरकार थी। मनमोहन सरकार कैसी कमजोर सरकार थी, मनमोहन सरकार की कूटनीति कैसी कमजोर थी, यह भी उल्लेखनीय है। नरेन्द्र मोदी ने सरकार में आने के साथ ही साथ चीन की घेराबंदी शुरू की थी। चीन को जैसे के तैसे में जवाब देना शुरू कर दिया था। चीन की घेराबंदी के लिए मोदी ने ईरान में बंदरगाह निर्माण का ठेका लिया जो चीन को स्वीकार नहीं हुआ। इसके साथ सी साथ भारत ने वियतनाम के साथ तेल उत्खनन की हिस्सेदारी बढ़ाई।
-विष्णुगुप्त








भारत ने दुनिया को यह बताया कि सीपीईसी परियोजना विवादित परियोजना है, यह भारतीय भूभाग का अतिक्रमण है, भारतीय भूभाग पर पाकिस्तान अवैध कब्जा कर रखा है, उस पर चीन आर्थिक गलियारे का निर्माण नहीं कर सकता है। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी ने बलूचिस्तान की राष्टÑीयता का भी समर्थन कर दिया, दुनिया के सामने यह कह दिया कि बलूचिस्तान में पाकिस्तान जन भावना को कूचल रहा है, सीपीईसी के खिलाफ
बलूचिस्तान की जनभावना है। बलूचिस्तान के हितों का बलिदान कर यह परियोजना बनायी जा रही है। इस परियोजना से सर्वाधिक लाभ पाकिस्तान के पंजाब रा’य को होगा जबकि सर्वाधिक नुकसान बलूचिस्तान प्रांत का होगा। उल्लेखनीय यह भी है कि पाकिस्तान के अंदर में अलग बलूचिस्तान देश के लिए हिंसक-अहिंसक आंदोलन चल रहा है।
पाकिस्तान के अंदर ही नहीं बल्कि चीन के अंदर भी सीपीईसी को लेकर विवाद-विरोध जारी है, चीन के राष्टÑपति जिनपिंग को यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि यह परियोजना चीन की बर्बादी के कारण बनेगी। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स भी सीपीईसी के खिलाफ मुखर हुआ है। ग्लोबल टाईम्स ने मुखर विरोध करते हुए लिखा है कि यह परियोजना सिर्फ बर्बादी ही लायेगी। इस परियोजना की नियत राशि 46 अरब डॉलर से बढती ही जा रही है, वर्तमान में लागत राशि 60 अरब डालर तक पहुंच चुकी है। परियोजना पूरी होने पर भी लाभकारी नहीं होगी क्योंकि परियोजना की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। अभी चीन के करीब 6000 हजार नागरिक पाकिस्तान के अंदर में हैं जो दिन-रात काम कर रहे हैं पर उनकी सुरक्षा हमेशा खतरे में रहती है। चीन नागरिकों की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान की सेना के 15000 हजार जवान लगे हुए हैं। ग्लोबल टाइम्स यह भी लिखता है कि भारत के विरोध के कारण और कोई देश इस परियोजना से जुडना नहीं चाहता है। इसलिए चीन को इस खतरे की घ्ांटी वाली परियाजना पर फिर से विचार करना होगा। चीन के सरकारी अखबार का आकलन एकदम सच है। जब पाकिस्तान का ही भविष्य तय नहीं है तो फिर सीपीईसी परियोनजा का भविष्य कैसे लाभकारी होगा?

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