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मगर हम चुप रहेंगे

Monday, September 10, 2018 10:15 AM

कॉनसेप्ट फोटो

ठाले बैठे लोगों को बातें बनाने के सिवाय कोई काम भी तो नहीं है। बातें भी ऐसी बनाते हैं, जिनका तोड़ तो दूर की बात सिर-पैर तक नहीं होते। लेकिन बातें तो बातें ही हैं, कुछ तो निगेटिव-पॉजिटिव असर तो करती है। अब देखो ना जब से जोधपुर वाले गज्जू बन्ना को भगवा वाले दल की इलेक्शन कमेटी का कन्वीनर बनाया।

तब से बातें करने वालों का मुंह कुछ ज्यादा ही खुला है। मुंह हाथ वाले खोले तो समझ की बात है, मगर भगवा वाले खोले तो माथा ठनकना लाजमी है। भगवा वालों में खुसरफुसर है कि गज्जू बन्ना की आड़ में बड़े रावळे की पटेलाई कम करने की चाल है। समझने वाले तो समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है। लेकिन हम तो चुप ही रहेंगे।

घोड़े चले अस्तबलों की ओर
आज हम घोड़ों की बात करेंगे। घोड़े भी किसी सराय से नहीं बल्कि दोनों बड़े दलों से ताल्लुकात रखते हैं, और राज के लिए मैदान में उतरे थे। इनमें से कई घोड़े तो वेग से भी तेज गति से दौड़ने का माद्दा भी रखते हैं। पिछले साढ़े चार साल में कई मौकों पर अपनी केपेसिटी को दिखाने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी, चाहे वो अपनी सात पीढ़ी के जुगाड़ के लिए ही क्यों ना हो। चर्चा है कि इनमें से कई घोड़े तो जाड़ों में होने वाली जंग से पहले ही अस्तबलों की ओर लौटने लगे हैं। अब बेचारे सेनापतियों के पास उनकी तरफ देखने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं है।

नाराजगी बॉडी लैंग्वेज से
पिछले कुछ दिनों से काले कोट वालों में बॉडी लैंग्वेज को लेकर काफी खुसरफुसर है। हो भी क्यों ना, कभी-कभी न्याय के देवताओं की नाराजगी राज को भी तो भारी पड़ती है। खुसरफुसर है कि राज और उसके रत्नों की बॉडी लैंग्वेज काले कोट वालों के सूट नहीं कर रही, सो गाहे-बगाहे उसका असर भी दिखाई देता है।

अब राज के रत्नों को कौन समझाए कि काले कोट वाले देवताओं से सहयोग की उम्मीद करते हैं, तो हैकड़ी से सौ कोस दूर रहने की सीख देने वाली पाठशाला ढूंढने में ही भलाई है, वरना कॉन्फिडेंस में लेना तो दूर की बात कटघरे में खड़े में देर नहीं लगेगी। 

72 बनाम 28 का फेर
सूबे में इन दिनों भगवा वालों के साथ हाथ वाले भाई लोग 72 बनाम 28 के फेर में फंसे हुए हैं। कईयों ने तो छह तारीख के बाद इस फेर से बाहर निकलने के लिए मां-बाप के साथ ही भगवान तक की कसमें खाना शुरू कर दिया। लेकिन बेचारों को यह थोड़े ही पता था कि गुरू का असर ऊपर से नीचे तक हिला के रख देगा।

राज का काज करने वालों में चर्चा है कि शतरंज की चाल तो भगवा वालों ने खेली है, मगर बेचारे हाथ वाले भी पिसते नजर आ रहे हैं। यह फेर उनके लिए न तो उगलते बन रहा है और न निगलते। हाथ वालों के लिए भी 72 से 28 कुछ ज्यादा इंपोरटेंट है, सो इस मसले पर अपना मुंह बंद रखने में ही भलाई समझ रहे हैं।

एक जुमला यह भी
जब से न्याय के बड़े मंदिर ने वेस्टर्न कल्चर का पौध रोपण का फरमान सुनाया, तब से सूबे में एक जुमला जोरों पर हैं। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि चुनावी जंगों को लेकर है। जुमला है कि अब अगले चुनाव न्याय के मंदिरों के फरमान और वोटर की समझ के होंगे। चूंकि हिन्दुस्तानी वोटर पहले आर्थिक और सामरिक रूप से ग्लोबल हो चुके थे और अब दो कदम आगे बढ़ सामाजिक रूप से भी ग्लोबल हो गए। तभी तो न्याय के मंदिर के एक फरमान से दिल्ली दरबार तक के पसीने छूटने लगे हैं।

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