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बजट नहीं पूरा करेगा आर्थिक चुनौतियां

Tuesday, February 05, 2019 10:20 AM

बजट में वित्त मंत्री ने छोटे किसानों को सीधे नगद देने की घोषणा की है। 2 हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसानों को 500 रूपए प्रति माह या 6,000 रूपए प्रति वर्ष सीधे उनके खाते में डाले जाएंगे। संभव है की वित्त मंत्री ने इस रास्ते 2019 के चुनाव को साधने का प्रयास किया है। इस रणनीति को समझने के लिए आगामी चुनाव के परिदृश्य पर नजर डालनी होगी। पिछले चार वर्षों में भाजपा कि पालिसी थी कि गाय एवं राम मन्दिर के मुद्दों पर हिन्दू वोट का ध्रुविकरण किया जाए। इसके साथ-साथ अर्थव्यवस्था को भाजपा विकसित देशों कि तर्ज पर बढ़ाना चाहते थी जैसे मेक इन इंडिया और बुलेट ट्रेन के माध्यम से।

विकसित देशों का अनुसरण करने के इस प्रयास में नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया जिससे कि विकसित देशों की तरह भारत में भी डिजिटल इकनोमी स्थापित हो। ये कदम सरकार के लिए विशेष हानिप्रद सिद्ध हुए। नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे उद्योगों को पस्त कर दिया। ये छोटे उद्योग ही रोजगार उत्पन्न करते थे। फलस्वरूप रोजगारों का संकुचन हुआ। रोजगार के संकुचन से आम आदमी कि क्रय शक्ति का ह्रास हुआ और बाजार में माल की मांग में ठहराव आ गया। यही कारण है कि अर्थव्यवस्था की विकास दर पूर्ववत 7 प्रतिशत पर टिकी हुई है

गरीब यदि अमीर की तरह 100 रूपये की एक कप चाय पिए तो उसका बजट बिगड़ जाता है। इसी प्रकार भारत द्वारा अमीर देशों की पॉलिसी लागू करने से भारत की अर्थव्यवस्था बिगड़ गई है। इसबिगड़ती स्थिति को सम्हालने के लिए वित्त मंत्री ने छोटे किसानों को सीधे रकम देने की घोषणा की है। साथ-साथ इनकम टैक्स में छूट को 2.50 लाख से बढ़ाकर 5.00 लाख किया है। इन कदमों से अर्थव्यवस्था की मुख्य चुनौतियों का सामना नहीं हो सकेगा और भाजपा को विशेष राजनीतिक लाभ भी नहीं होगा ऐसा दीखता है।


पहला मुद्दा किसानों का है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कृषि उत्पादों के दाम में निरंतर गिरावट आने से सम्पूर्ण विश्व के किसान दबाव में हैं। सरकार की पॉलिसी है कि उत्पादन बढ़ा कर किसानों का हित हासिल किया जाए। परन्तु यह सफल नहीं हो रहा है। कारण यह कि उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ बाजार में दाम गिर जाते हैं और किसान को लाभ के स्थान पर घाटा होता है। इस समस्या का उपाय यह था कि सरकार द्वारा किसानों के हित के लिए जो सब्सिडी दी जा रही है जैसे खाद्यान्न, फर्टिलाइजर, बिजली और मनरेगा पर उसे किसान को सीधे उसके खाते में डाल दिया जाता।

ऐसा करने से ऋण माफी का जो भूचाल चल रहा है उससे देश मुक्त हो जाता चूंकि किसान को एक निश्चिित सम्मानजनकआय मिल जाती। मेरी गणित के अनुसार यदि वर्तमान कृषि सब्सिडियों को समाप्त कर दिया जाता तो देश के लगभग हर किसान परिवार को 50 हजार रुपया प्रति वर्ष दिया जा सकता था। ऐसा करने से किसान को उसके खाते में सीधे रकम मिल जाती और वह आत्महत्या करने को मजबूर नहीं होता।

किसानों में उत्साह का वातावरण उत्पन्न हो जाता और वे मनरेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के प्रपंच से भी मुक्त हो जाते। परन्तु वित्त मंत्री ने बजट में केवल 6,000 रूपए प्रति वर्ष देने की घोषण की है। यह कदम सही दिशा में है परन्तु ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है। वर्तमान सब्सिडियों को समाप्त करने एवं 50,000 रुपये प्रति वर्ष देने से वित्त मंत्री चूक गए।
दूसरा मुद्दा रोजगार का है। जैसा उपर बताया गया है कि जीएसटी के कारण छोटे उद्योगों को परेशानी हुई है।

यह आज भी जारी है। कारण यह है कि छोटे उद्यमों को खरीदे गए माल पर जीएसटी अदा करना पड़ता है परन्तु उनके  माल को खरीदने वाले को वह सेट आफ नहीं मिलता है। मान लीजिए कोई व्यापारी किसी बड़े उद्यमी से 118 रूपये का माल खरीदता है। इसमें उसे खरीद पर 18 प्रतिशत से 18 रुपए की अदा की गई जीएसटीका सेट आॅफÞ या रिफंड मिल जाता है। उसकी शुद्ध लागत 100 रुपए पड़ती है। इसकी तुलना में यदि वही व्यापारी किसी छोटे उद्यमी से वही माल 118 रुपए में खरीदे तो छोटे उद्यमी द्वारा इनपुट पर अदा की गई जीएसटी का रिफंड नहीं मिलता है

और उसकी शुद्ध लागत 118 रुपए पड़ती है। इसलिए जीएसटी के लागू होने के बाद व्यापारियों ने छोटे उद्यमों से माल खरीदना कम कर दिया है और छोटे उद्यम बैकफुट पर आ गये हैं। इन्हीं छोटे उद्यमों द्वारा अधिकतर रोजगार बनाए जा रहे थे जो अब मंद पड़ गया है। रोजगार सृजन में ठहराव का यह प्रमुख कारण है। इसका सीधा उपाय था कि सरकार छोटे उद्यमियों को कम्पोजिसन स्कीम के अंतर्गत इनपुट पर अदा किए गए जीएसटी का रिफंड लेने की व्यवस्था करती। तब छोटे उद्यमी भी 100 रूपए में उसी माल को बेच सकते और व्यापारी के लिए बड़े और छोटे उद्यमी से माल खरीदने में अंतर नहीं पड़ता। छोटे उद्योग खड़े हो जाते तो तत्काल देश में उत्साह की लहर पैदा हो जाती।

ऐसे ठोस कदम उठाने के स्थान पर वित्त मंत्री ने छोटे उद्योगों को लोन में कुछ छूट देने मात्र की घोषणा की है जो की नई बोतल में पुराणी दवा है। यह निष्प्रभावी रहेगी। सरकार गाय और मंदिर से भी लाभ नहीं मिल रहा है। कारण कि गाय के विषय को दलित और मुसलमान विरोधी माना जा रहा है और मंदिर के विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के हाथ बांध रखे हैं। ये मुद्दे सरकार के लिए हानिप्रद साबित हो रहे हैं।

इसका उपाय यह है कि गाय एवं राम मन्दिर के स्थान पर गंगा का विषय उठाकर हिन्दू वोट का ध्रुविकरण करे। सरकार को उत्तराखंड में गंगा पर बन रही तीन जल विद्युत परियोजनाएं सिंगोली भटवारी, तपोवन विष्णुगाड और विष्णुगाड पीपलकोटी को तत्काल निरस्त कर देना चाहिए था।










 

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