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Sunday 17th of February 2019
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विकास की अराजकता और प्रकृति

Monday, February 11, 2019 10:10 AM

व्यक्तिगत स्वच्छता की बात हो या सार्वजनिक स्वच्छता की भारत देश में यह संभव नहीं लगता। दिल्ली हो चाहे उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान और पंजाब-हरियाणा जैसे अधिसंख्य राज्य हों, सब जगह अनुदार, महामूर्ख, पेट भरने और नौकरियों में टाइम पास करने वाले लोगों की भरमार है। सड़क की अराजकता इतनी व्यथित, दुखी और कुंठित करने वाली है कि लगता है मशीनगन लेकर उन सारे लोगों को मौत के घाट उतार दो जिनके कारण सड़कों की अराजकता,  दुर्व्यवस्था, असभ्यता और बाकी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इस समय देश-विदेश, भारत में तो इसका कटु अनुभव सभ्य लोगों को तन-मन से अस्वस्थ बना रहा है।

महानगरों, मध्यमाकार के शहरों से लेकर छोटे नगरों अ‍ैर सड़क मार्ग से जुड़े गांवों में मोटर वाहनों का जैसा आतंक मचा हुआ है और मोटर वाहन चालकों की जैसी मानसिकता उभर रही है तथा इन विक्षिप्त पागल लोगों के बीच जो सभ्य नागरिक पैदल यात्री बनकर जीवन- असुरक्षा की भावना से पिस रहे हैं और जो बेचारे सड़क अराजकता में अपनी जान गंवा रहे हैं या जिनके अंग-भंग हो जा रहे हैं, उन परिस्थितियों में यही प्रतीत होता है कि दुनिया को तीसरा विश्व युद्ध परमाणु अस्त्र-शस्त्रों से करने की आवश्यकता नहीं। लोग ऐसे ही मरेंगें। कुछ लोग परिवहन दुर्व्यवस्था से मरेंगे, कुछ मोटर वाहनों की अनियंत्रित तीव्र गति व तीखे हॉर्नों से जान जोखिम में डालेंगे, कुछ अराजक व अनियंत्रित मोटर वाहनों और इनके चालकों द्वारा उड़ाए गए धूल तथा डीजल-पेट्रोल की काली रासायनिक गंदगी से मरेंगे।भारत में इतना ही पर्याप्त नहीं था

सभ्य नागरिकों के जीवन उजाड़ने के लिए। मुख्य मार्गों के किनारे भूमि पर अतिक्रमण करने की भूखी आबादी द्वारा अतिक्रमण के कारण फैलाई गई अराजकता, असभ्यता और गंदगी के कारण शहर हों या सड़क से जुड़े गांव सब नरक बन रहे हैं। नेताओं का मर गया है। उनका मरेगा ही। जब आधे से अधिक जनता महामूर्ख होगी तो नेता देशभर में तरह-तरह की दुर्व्यवस्था फैलने के कारकों व कारणों को देखने और उनका समाधान करने की दिशा में कुछ नहीं करेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि नेता वही काम करते हैं जो जनता अपनी विशाल संख्या के दबाव में उनसे करवा सकती है। लेकिन जनता तो भेड़चाल, कोल्हू के बैल, कुए के मेंढक जैसी उन सभी कहावतों को चरितार्थ कर रही है

जो मूर्खता की सीमा पार करने के सदंर्भ में बनाई गई हैं। जनता ने अपने लिए बहुमत से जो कमाया है और जो वर्षों से जन दबाव के कारण नेताओं ने उन्हें दिया है उन परम अमृत तत्वों- पदार्थों- वस्तुओं में शामिल हैं मदिरा, देशी भाषा में दारूद्धए बीड़ी- गुटखा- तंबाकू- खैणी- चरस कोकीन,गांजा, नकली दूध व अनाज, नकली फल व सब्जियां, जान को आते व सुविधा कम दुविधा अधिक बनते मोटर वाहन, अनमोल रत्न प्लास्टिक जो यहां-वहां फैलकर-जलकर, उड़कर लोगों को कैंसर सहित अनेक रोग बांट रहा है, मोबाइल फोन और इन पर इंटरनेट जिसकी अज्ञात व अदृश्य विकिरणों के कारण लोग दिमागी रूप से सुन्न और निष्क्रिय हो रहे हैं

प्राइवेट स्कूल व प्राइवेट हास्पिटल जो क्रमश: शिक्षा व स्वास्थ्य के नाम पर सबसे ज्यादा लूट मचाने वाले तंत्र बन चुके हैं, घर या दूसरे भवन निर्माण में लगे लोग जो प्रकृति का दोहन कर- कर के शहरों व गांवों में कंक्रीट के जंगल खड़े कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त बहुत कुछ दिया है नेताओं ने लोगों को उनकी लालची, विकृत, नकारात्मक, भोगोपभोगी व विध्वंशक इच्छाओं के अनुरूप जिसके दुष्परिणामों में से सबसे बड़ा दुष्परिणाम यही हुआ कि मनुष्य अब सच में मशीन बन चुका है। देश- विदेश में सत्ता के लालची व्यक्ति ;नेता, वस्तुओं से पटे पड़े जिस परिवेश को लोगों के बीच विकास का पैमाना बता रहे हैं, वास्तव में विकास का वह पैमाना यही सिद्ध करता है कि विकास केवल और केवल वस्तुओं का हो रहा है। वस्तुओं, उत्पादों,  सुविधाओं, धन-संसाधनों के आसुरी उपभोग से जो सामाजिक स्थितियां तैयार हो रही हैं

वे मानव का पतन कर रही हैं। भारतीय सड़कों, शहरों, गांवों, गली,  मोहल्लों व परिवारों में आधुनिक वस्तुओं और सुविधाओं का जैसा अनियंत्रित उपभोग व दुरुपयोग हो रहा है वह सिद्ध करता है कि भारत में विज्ञान-विकास वरदान नहीं अभिशाप बन चुके हैं। वस्तुगत विकास का मूल्य चुकाने के लिए मनुष्य अपनी मनुष्यता, सभ्यता, संवेदना, परस्पर प्रेम-सहकारिता और सर्वाधिक जीवनानुकूल प्राकृतिक व्यवस्था को भूल-विसार कर उसका त्याग कर चुका है। पृथ्वी पर मानव जीवन इस परिस्थिति से बुरी तरह घिर चुका है। बिना प्रलय के इसमें परिवर्तन संभव नहीं। कोई नेता, कोई विचारक, कोई वैज्ञानिक, कोई भी साधु या संत अथवा महात्मा इस परिस्थिति से मनुष्य जीवन को बाहर नहीं निकाल सकता।

इस नारकीय विकास यात्रा को रोका नहीं जा सकता। परिपक्व और प्रौढ़ मनुष्य यदि इस नारकीय विकास यात्रा से विमुख होता भी है तो नए बच्चे बाल व युवावस्था में रहते हुए इस यात्रा को सुखदायी मानेंगे। युवावस्था में इस नरक की यात्रा कर चुकने के बाद प्रौढ़ावस्था में पहुंचने वाले मनुष्य निस्संदेह आधुनिक विकास के जंजाल से बाहर आएंगे और वे मोहभंग की स्थिति में होंगे। लेकिन दूसरी ओर उनकी तुलना में अधिक संख्या में उपस्थित युवक- युवतियां विकास की नरक यात्रा का ध्वज पुन: अपने हाथों में थामेंगे। यह यात्रा अनवरत चलती रहेगी।

स्वदेशी- विदेशी सत्ता और प्रतिष्ठानों में बैठकर लोगों को हांकने की इच्छा पाले बैठे लोग नेता, शासक इस अनवरत यात्रा को रुकने नहीं देना चाहते, रोकना नहीं चाहते। ऐसे में मनुष्य जीवन के लिए आत्मघाती इस विकास यात्रा पर प्रतिबंध तब ही लगेगा जब दुनिया में प्राकृतिक उथल-पुथल के बाद सभी वैज्ञानिक और विकास यात्राओं के प्रतिमान समाप्त हो जाएंगे। जगत तब ही रहने योग्य होगा जब विकास के दंश से ग्रस्त मनुष्य जीवन प्रलंयकारी प्राकृतिक परिवर्तन के बाद नया सूर्योदय देखेगा। विकासजनित पापों, कष्टों तथा गहन आत्मग्लानि से भूलोक तब ही मुक्त होगा जब मानव जीवन की यात्रा पुन: आरंभ होगी। लोग समझें, दुनिया के कर्ताधर्ता चिंतन-मनन करें और अबोध व अवयस्क मनुष्यों को समझाएं कि विकास का अर्थ वस्तुओं.उत्पादों के ढेर पर बैठ भोगोपभोग का झूला झूलना नहीं। -विकेश कुमार बडोला









विकास का अर्थ है विचारोंए व्यवहार और आत्मबोध का विस्तार। विकास का अर्थ है स्वयं को प्राकृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप साधना। मनुष्य सदैव ध्यान करे कि वह भूलोक पर थोड़े समय के लिए है। यदि ऐसा होता है तो वस्तुओं का लालच नहीं होगा। वस्तुओं का लालच घटेगा तो प्रकृति का दोहन नहीं होगा। प्रकृति का दोहन नहीं होगा तो पृथ्वीए नभए जलए वायुए अग्नि सब शांत और संतुलित हो रहेंगे। तब प्रलय भी नहीं होगी और भूलोक का जीवन मरेगा नहीं। विचारयोग्य बात यही है कि क्या हमारे कर्ताधर्ता इस दिशा में कुछ कर रहे हैंघ्

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