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इस कठिनाई का सबब क्या?

Saturday, February 09, 2019 09:40 AM

- शिवेश गर्ग
जिस राम मंदिर के निर्माण के लिए इलाहाबाद में होने वाले अर्धकुंभ को महाकुंभ की तरह पेश किया गया और सरकारी खर्चे पर तमाम तामझाम की व्यवस्था की गई, पर यक-ब-यक ऐसा क्या हुआ कि कुंभ समाप्त होने से पहले ही संघ और विश्व हिंदू परिषद की ओर यह ऐलान करना पड़ा कि अगले आम चुनाव तक राम मंदिर आंदोलन स्थगित किया जाता है। वह नहीं चाहता कि यह कोई चुनावी मुद्दा बने। विहिप का कहना है कि सेक्युलर बिरादरी को इस पवित्र आंदोलन को राजनीतिक दलदल में घसीटने का अवसर न मिले इसलिए वह इसे स्थगित कर रहा है। विहिप की इस मासूमियत पर हंसा जाए या रोया जाय, तय कर पाना मुश्किल हो रहा है।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री कांग्रेस को सेवा भाव की नसीहत देते हुए बतला रहे थे कि कैसे उनकी पार्टी 2 सीटों से सत्ता तक पहुंच गई। मुल्क का सियासी तारीख गवाह है कि इस (सेवा भाव) में राम मंदिर के मुद्दे की कितनी अहम भूमिका है। राम मंदिर को  चुनावी मुद्दा बनाकर ही भाजपा ने 2 सीटों से बहुमत का सफर तय किया है। मंदिर निर्माण के लिए मुल्कभर में रथयात्रा निकाल कर लालकृष्ण आडवानी ने भाजपा की सियासी जमीन मजबूत की और इसी उपजाऊ जमीन पर ही नरेन्द्र मोदी ने सियासत की फसल काटी।

मोदी सरकार ने देश संभाला और उसके बाद उत्तरप्रदेश जीतकर भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री के लिए चुना तो संदेश साफ था कि मंदिर निर्माण होकर रहेगा। नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ, दोनों ने इन उम्मीदों को खूब हवा भी दी। दशहरे से लेकर दीपावली तक सारे मौके इन उम्मीदों को और बढ़ाने के लिए भुनाए गए। पहले लोकसभा और बाद में उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में राम मंदिर भाजपा का प्रमुख चुनावी एजेंडा रहा। बल्कि राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के चुनावों में भी मंदिर मुद्दे को प्राथमिकता में रखा गया।

पर, अचानक इस यू-टर्न का सबब क्या? बहरहाल, विहिप की तुलना में संघ प्रमुख मोहन भागवत कहीं ईमानदार नजर आए। फरवरी के पहले सप्ताह में होने वाले कुंभ की धर्मसभा में बोलते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि उनको हमारे आंदोलन से कठिनाई नहीं होनी चाहिए, उनको मदद होनी चाहिए ऐसा ही हमको करना पड़ेगा। यहां ‘उनको’ यानी भाजपा को और ‘हमको’ यानी संघ और विश्व हिंदू परिषद।

यहां एक बात और साफ है कि 2018 के अंतिम महीनों से मंदिर निर्माण को लेकर संघ और विहिप की ओर से जो मुहिम तेज की गई थी, भाजपा को उससे कठिनाई पैदा होने लगी है। तो फिर यह सवाल भी अहम हो जाता है कि जिस आंदोलन ने भाजपा को फर्श से अर्श तक पहुंचाया, आखिर उस आंदोलन से उसे अचानक कठिनाई क्यों पैदा होने लगी? जानकारों की माने तो दो वजहें हैं। पहला तो यह कि पांच साल सत्ता में रहने के बाद अब राम मंदिर का मुद्दा भाजपा के लिए लाभकारी न रहा। क्योंकि जनता को राम मंदिर से इतर और भी कई चीजों की दरकार है।

मसलन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सड़क, पर्यावरण जैसे बुनियादी सवाल। और फिलहाल जनता मोदी सरकार से उन बातों पर जवाब चाहती है। ऐसे में भाजपा अगर राम मंदिर को सियासी मुद्दा बनाती है तो यह माना जाएगा कि मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कवायद है। पर यह दलील अधिक दमदार नहीं नजर आती। क्योंकि अगर यही करना था तो कुंभ का जो तमाशा खड़ा किया गया वह न होता। क्योंकि मंदिर निर्माण पर यू-टर्न लेने से पहले तक अर्द्धकुंभ के बीच प्रयागराज में विहिप की की ओर से आयोजित धर्मसभा में प्रस्ताव स्वीकार किया गया था कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण तक हिंदू चैन से नहीं बैठेंगे और न ही दूसरों को चैन से बैठने देंगे।

पर संतों की यह बेचैनी अब भाजपा के लिए कठिनाई का सबब बनी है तो बताया जा रहा है कि वजह भी संत ही बने हैं। जानकार मानते हैं कि द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती की मंदिर निर्माण की सक्रियता ने संघ और विहिप का खेल खराब किया है। अब तक दोनों ही राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर अपना निजी एकाधिकार मानते रहे हैं। पर स्वरुपानंद ने इस एकाधिकार में यह कहकर सेंघ लगा दी कि वे 21 फरवरी को मंदिर निर्माण के लिए अयोध्या के लिए कूच करेंगे। और यह बयान ही मोदी सरकार, संघ और विहिप के लिए परेशानी का सबब बन गया।

क्योंकि जिस मसले की सियासत पर वे अपना पुश्तैनी अधिकार मानते रहे उसमें स्वरुपानंद उसी अधिकार पर हक जमाने चले आए। गौर करने की बात है कि संघ और विहिप के लोग जिसे संत समाज कहते हैं स्वरुपानंद भी उसी संत समाज से आते हैं पर दोनों ही एक दूसरे की वैधता को खारिज करते रहे हैं। जिसकी एक वजह यह भी है कि स्वरुपानंद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से करीबी माने जाते हैं। इस नाते उन्हें कांग्रेस संत भी माना जा सकता है। कायदे से संतों की तो कोई जाति नहीं होती, सो  इस नाते उनकी कोई पार्टी भी नहीं होनी चाहिए।

पर फर्ज कीजिए कि कांग्रेसी समझे जाने वाले स्वरुपानंद ने अगर अयोध्या में मंदिर निर्माण की मुहिम को भाजपा और संघ से झटक लिया, तो भाजपा के हाथों से तो वह मुद्दा ही हमेशा के लिए छिन जाएगा, जिसने उसे अर्श से फर्श तक पहुंचाया। ऐसे में भाजपा और संघ की बेचैनी समझी जा सकती है।

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