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तो क्या चॉकलेटी है दलितों का सवाल

Wednesday, September 12, 2018 08:25 AM

एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद से ही मुल्क में दलित विमर्श और सियासत तेज है। संशोधन के खिलाफ  सवर्णों का भारत बंद हुआ तो अब कई चिंतकों को दलित शब्द से आपत्ति है। वैसे इन सब के बीच पिछले दिनों एक अजीबोगरीब बयान लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की ओर से आया। सुमित्रा महाजन का कहना है कि दलितों को ‘एट्रोसिटी एक्ट’ के रूप में पहले बड़ी चॉकलेट दे दी गई, जिसे अब तुरंत छीनना ठीक नहीं है, क्योंकि इससे उनके गुस्से का विस्फोट हो सकता है। इसलिए थोड़े समय बाद समझा-बुझाकर वह चॉकलेट वापस ले ली जाएगी।

‘एट्रोसिटी एक्ट’ के विरोध में भारत बंद के दौरान उनने अपने निर्वाचन क्षेत्र इंदौर में भारतीय जनता पार्टी के व्यापारी प्रकोष्ठ के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह उद्गार व्यक्त किए। सुमित्रा जी यहीं नहीं रुकती हैं। उनने अपनी बात समझाने के लिए इसे विस्तार भी दिया।  कहा, ‘मान लीजिए कि अगर मैंने अपने बेटे के हाथ में एक बड़ी चॉकलेट थमा दी और बाद में मुझे लगा कि इतनी बड़ी चॉकलेट खाना उसके लिए अच्छा नहीं होगा। अब अगर हम बच्चे के हाथ से वह चॉकलेट जबरदस्ती लेना चाहें, तो हम नहीं ले सकते, क्योंकि ऐसा करने पर वह गुस्सा करेगा और रोने लगेगा।

लेकिन दो-तीन समझदार लोग बच्चे को समझा-बुझाकर उससे वह चॉकलेट वापस ले सकते हैं।’ अव्वल तो वे लोकसभा की अध्यक्ष हैं और अलबत्ता वे गाहे बगाहे यह भूल भी जाती हों कि वे किस पद पर आसीन हैं, फिर भी एक राजनेता के तौर पर दलित मुद्दे की उनकी यह समझ हैरान करती है। इस मुल्क के लोकसभा अध्यक्ष के लिए दलितों का सवाल चॉकलेट भर का मुद्दा है। उनके लिए दलित समुदाय एक ऐसा जिद्दी बच्चा है जिसे ‘एट्रोसिटी एक्ट’ के रूप में बड़ी सी चॉकलेट थमा दी गई है। और तुर्रा यह कि वे उसे उनसे छीन भी लेना चाहती हैं, बस सवाल समय भर का है।

कुछ समय के बाद कुछ समझदार लोग उन्हें समझा बुझाकर यह चॉकलेट वापस ले लेंगे। मौजूदा सियासत और कानून की नजर से उनके इस बयान को समझा जाए तो लब्बोलुआब यह निकलता है कि फिलहाल एट्रोसिटी एक्ट से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलना मोदी सरकार की मजबूरी थी, पर मुमकिन है कि 2019 के चुनाव के बाद दलित समुदाय को दी गई यह ‘चॉकलेट’ उससे छीन ली जाएगी। वैसे एट्रोसिटी एक्ट के मामले में सुमित्रा महाजन का बयान थोड़ा घरेलू किस्म का जरूर हो गया है जो बेशक उनके पद की गरिमा के खिलाफ  है।

पर दलित आरक्षण को लेकर भी उनकी अपनी एक समझ है जिसे वे समय-समय पर जाहिर करती रहीं है। इससे पहले वे दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मिलने वाले आरक्षण को लेकर भी अपने विचार व्यक्त कर चुकी हैं। तकरीबन तीन साल पहले गुजरात के बडोदरा में आयोजितएक कार्यक्रम में उनने कहा था कि संविधान में आरक्षण का प्रावधान महज 10 साल के लिए रखा गया था, लेकिन धीरे-धीरे यह स्थाई व्यवस्था बन गया है। अब समय आ गया है जब हमें आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए। किसी संवैधानिक पद पर बैठे एक राजनेता के आरक्षण के इतिहास का यह बोध भी परेशान करने वाला है।

संविधान में 10 साल के लिए जिस आरक्षण की व्यवस्था होने का दावा लोकसभा अध्यक्ष कर रही थीं वह तो केवल विधायिका के आरक्षण से जुड़ा था, जिस प्रावधान के तहत हर 10 साल बाद आरक्षण की समीक्षा संसद करती है और आम सहमति से उसे फिर से अगले दस साल के लिए बढ़ा दिया जाता है। पर जहां तक नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में दिए जाने वाले आरक्षण का सवाल है उसमें संविधान की ओर से कोई समय सीमा का निर्धारण नहीं किया गया है। पहले यह आरक्षण एससी-एसटी को दिया गया और 1992 में मंडल कमीशन की सिफारिश लागू होने के बाद पिछड़े वर्ग के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था की गई, जो अब तक लागू है।

जहां तक संविधान में आरक्षण की व्यवस्था का सवाल है तो उसे समझने के लिए कंवल भारती की यह कविता बेहद मददगार साबित हो सकती है। जो मुक्ति का संग्राम लड़ा था तुमने, वह जारी रहेगा उस समय तक, जबतक कि हमारे, मुर्झाए पौधों के हिस्से का सूरज उग नहीं जाता। असल में, हमारा संविधान दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रावधान उनके लिए सूरज के उगने का रास्ता प्रदान करता है। पर हमारा सवर्ण समाज इस आरक्षण को बख्शने को तैयार नहीं। वैसे सवर्णों की इस मानसिकता पर जय प्रकाश कर्दम का यह सवाल काबिलेगौर है, तुम्हारा आरक्षण उचित है और मेरा आरक्षण अनुचित।

अब हर क्षेत्र में होगी समान रूप से हिस्सेदारी, शासन-प्रशासन से लेकर मैला ढोने, जूता गांठने और झाड़ू लगाने तक के काम में भी बांटनी होगी समानता। सवाल है कि क्या सवर्ण समाज यह समानता बांटने को तैयार है। आज कई दलित नेताओं को दलित शब्द से आपत्ति है, पर अहम सवाल है कि संबोधन के शब्द बदल देने से क्या मानसिकता बदल जाएगी। जब संवैधानिक पद पर बैठे लोग अपनी मानसिकता नहीं बदल पा रहे, तो क्या महज शब्द आम सवर्ण की मानसिकता को बदल पाएंगे। खबर दिल्ली की है कि सीवर में उतरने से पांच मजदूरों की मौत। यकीनन मरने वाले मजदूरों में कोई सवर्ण नहीं था।

-शिवेश गर्ग

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