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एक शहीद के बेटे का सवाल

Thursday, December 06, 2018 09:45 AM

बुलंदशहर में मजहब के नाम पर नफरत की सियासत के बीच हिंसा में मारे गए शहीद इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के बेटे अभिषेक का सवाल काबिलेगौर है। अभिषेक ने कहा है कि जिस पिता ने मुझे इंसान बनने की सलाह दी, आज उस पिता की हिंदू-मुस्लिम के नाम पर हुई लड़ाई में मौत हो गई। अब कल किसके पिता की बारी है? किसी सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए पिता के शोक संतप्त बेटे की ओर दिया गया यह एक बेहतरीन बयान है। यह सच है कि किसी भी सांप्रदायिक हिंसा में इंसान की जान जाती है हिंदू या मुसलमान की पहचान तो बाद में होती है।

जब हिंसा भड़कती है तो मरने वाला हिंदू होगा या मुसलमान यह कोई नहीं जानता। बहरहाल, एक कर्मठ पुलिस अधिकारी के काबिल बेटे के बयान से इतर योगेश सिंह की पत्नी और बहन ने कई मौजूं सवाल खड़े किए हैं जो सियासत और प्रशासन के लिहाज से बेहद गंभीर हैं। उनकी बहन और पत्नी का आरोप है कि सुबोध बिसाहड़ा में अखलाक केस की जांच कर रहे थे, इसलिए उन्हें मारा गया है। जिस बात की पुष्टि पूर्व डीजीपी एके जैन भी करते हैं। उनका कहना है कि बिसाहड़ा कांड के कई आरोपियों की गिरफ्तारी सुबोध ने कराई थी। ऐसे में इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि हिंदू संगठन नाराज रहे हों। बुलंदशहर हिंसा के मामले में दर्ज एफआईआर से भी बड़ा खुलासा होता है।

तहरीर से पता चलता है कि जिसने गोकशी की शिकायत की थी, उसी ने भड़काई थी हिंसा। मुख्य आरोपी योगेश राज नाम का एक शख्स है, जो सोशल मीडिया में खुद को एक भगवा संगठन का नेता होने का दावा करता है। एक वीडियो में योगेश राज इंस्पेक्टर सुबोध से बहस करता दिख रहा है। तहरीर में बताया गया है कि योगेश ही भीड़ को भड़का रहा था। पर दूसरी ओर, एफआईआर की तहरीर से उलट सूबे की  सरकार का जो रवैया है वह हैरान करने और डराने वाला है। सूबे के आला अधिकारी मामले पर जब प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे, तो उनने एक बार भी मुख्य आरोपी योगेश राज का नाम लेना जरूरी नहीं समझा। जबकि तहरीर में योगेश का तीन बार नाम लिखा है।

सूबे की सरकार के इस रवैये पर शहीद इंस्पेक्टर की बहन नाराजगी जताते हुए कहती हैं कि मुख्यमंत्री गऊ, गऊ, गऊ चिगाते रहते हैं। उसी गऊ माता के लिए मेरे भाई ने जान दे दी। अब सीएम कुछ करेंगे? उनके पास हमसे मिलने की फुर्सत नहीं है। पुलिस पर हमले हो रहे हैं और वह अभी तक चुप्पी साधे बैठे हुए हैं। बेशक, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मामले पर चुप्पी साध रखी हो, पर यह सच नहीं है कि उनने कुछ नहीं किया है। उनने बुलंदशहर की हिंसा पर सूबे की राजधानी लखनऊ में आला अधिकारियों के साथ बाजप्ता बैठक की है और बैठक के बाद मीडिया के लिए प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि प्रेस विज्ञप्ति में शहीद इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह पर एक भी शब्द लिखना मुनासिब नहीं समझा गया है।

बहरहाल, यह उनका अख्तियार है, पर प्रेस विज्ञप्ति में कांड को लेकर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया है वह किसी निर्वाचित सरकार की भाषा तो कतई नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोहत्या को एक बड़ी साजिश बताते हुए इसकी गंभीरता से जांच करने और सख्त से सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। यानी बगैर किसी प्राथमिक जांच के सूबे के मुख्यमंत्री यह मान बैठे हैं कि गोकशी ही हुई है। ऐहतियात के तौर पर उनने गोकशी के आगे कथित शब्द भी जोड़ने की जरूरत नहीं समझी। यकीन मानिए जब किसी सूबे की निर्वाचित सरकार के सरकारी कामकाज की भाषा में इस तरह की लापरवाही बरती जानी लगे तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।

बहरहाल, मुल्क के लिहाज से जो खतरनाक संकेत है वह यह कि अब  गाय के नाम पर केवल अखलाक या पहलू खां नहीं मारे जा रहे हैं। अब सुबोध कुमार सिंह भी मारे जाने लगे हैं। यह मुल्क के कथित सभ्य समाज के लिए एक निर्णायक घड़ी है, जो समाज अक्सर नाजुक मौकों पर चुप्पी साधकर अपनी सभ्यता की चादर थोड़ा और बड़ी करने लेने की जुगत में रहता है। जो सभ्य समाज अखलाक के वक्त भी चुप था और सुबोध कुमार सिंह के वक्त भी चुप ही है। अगर आप सोच रहे हैं कि यह कानून-व्यवस्था का मामला है, तो जनाब यकीकन आप गलतफहमी में हैं।

यह एक तरह का फासीवाद है जो बड़े जतन से हमारे-आपके जेहन में डाला जा रहा है। लिहाजा, शहीद इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के बेटे की इस बात पर गौर करें कि आज मेरे पिता ने इस हिंदू-मुस्लिम विवाद में अपना जीवन खो दिया, कल किसके पिता अपना जीवन खोएंगे? अभिषेक के इस सवाल का जवाब दे पाना फिलहाल सियासतदानों के कूब्बत में तो नजर नहीं आती, लिहाजा समाज को ही मिल बैठकर कोई जवाब खोजना होगा। 

- शिवेश गर्ग

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