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चेहरा नहीं मुद्दों की चुनौती

Tuesday, September 11, 2018 15:45 PM

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी(फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह आश्वस्त हैं कि 2019 में उनके सामने कोई चुनौती नहीं है। प्रधानमंत्री को भरोसा है कि 2019 में उनकी वापसी कोई नहीं रोक सकता। और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का आत्मविश्वास तो उनके भी चार फर्लांग आगे चल रहा है। उनका दावा है कि भाजपा अगले 50 पचास साल मुल्क पर शासन करेगी। गनीमत है कि उन्होंने 50 साल ही बोला, वरना उनका दावा कम से कम 100 साल का होना चाहिए।

अब कांग्रेस ने अगर इस मुल्क पर 60 साल शासन किया है कि तो भाजपा का तो कम से कम 100 साल का दावा बनता है। सियासत में आत्मविश्वास रखना कोई गुनाह नहीं है, पर इस तरह का आत्मविश्वास कई बार धोखा दे जाता है। मोदी-शाह के इस आत्मविश्वास पर अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ  ने बेहद प्रयोगात्मक हेडिंग लगाई है। हेडिंग में टाइटेनिक नाम के पानी के जहाज का बिम्ब लिया गया है।

यह जहाज 1912 में लंदन से अमेरिका जाने के रास्ते में आईसटीप से टकराकर डूब गया था। टाइटेनिक बनाने वाली कंपनी ने दावा किया था कि जहाज इतना मजबूत बनाया गया है कि यह किसी भी हाल में डूब नहीं सकता था। पर जहाज कैसे डूबा यह टाइटेनिक नाम की फिल्म में देखा जा सकता है। हम फिलहाल दावा नहीं कर सकते कि 2019 में क्या होने वाला है। पर फिलहाल तो एक नहीं कई तरह के आईसटीप नजर आने लगे हैं, जो मोदी सरकार नाम के टाइटेनिक को डूबो सकते हैं।

वैसे भी भारत जैसे लोकतांत्रिक मुल्क की सियासत में चुनौती कोई शख्सियत नहीं अलबत्ता मुद्दे बनते रहे हैं। सोमवार का भारत बंद भी ऐसे ही कुछ मुद्दों की बानगी है, जिसने तकरीबन 20 सियासी दलों को एक मंच पर ला खड़ा किया। इस बात पर बहस की जा सकती है कि कांग्रेस की अगुवाई में सोमवार का भारत बंद सफल रहा या विफल, पर भाजपा नेता भी इस हकीकत से इंकार नहीं कर सकते कि रुपए की गिरती और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत आज का  ज्वलंत मुद्दा है और इसने खुद उनके रणनीतिकारों को भी परेशान कर रखा है।

रुपए में ऐतिहासिक गिरावट के साथ-साथ कच्चे तेल की दरों में वृद्धि ने शहरी और ग्रामीण भारत की जनता के जीवन पर बेहद असर डाला है। असल में, रुपए की कीमत और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में ऐसा राब्ता है कि दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। चूंकि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो अपने आप हम बाहरी खाते पर दबाव देखते हैं और आयात की लागत बढ़ती है, घाटा बढ़ता है और साथ ही रुपए पर दबाव बढ़ता है। दूसरी ओर, अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन की वजह से पेट्रोल और डीजल की मूल्य निर्धारण व्यवस्था बाजार-निर्धारित दरों से जुड़े होने के बावजूद, केन्द्र और राज्यों द्वारा उत्पाद शुल्क और बिक्री कर या वैट के रूप में करों में तेज वृद्धि जारी है जिससे हालत और बदतर हुई है।

पिछले चार साल में न जाने कितनी ही बार उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी कर पेट्रोल और डीजल की कीमतों को बढ़ाए रखा गया है। जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ा है। जब पिछले साल ‘एक मुल्क और एक कर’ के नारे के साथ जीएसटी लगाया गया तब भी जानबूझकर पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया। हालांकि इस बीच सरकार के नुमाइंदे पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने की बात जरूर करते रहे हैं। सोमवार को भी विपक्ष के भारत बंद के बाद पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने फिर से ऐसी ही कुछ बातें कहीं हैं।

पर ऐसा पहली बार नहीं किया जा रहा है। मुमकिन है कि केन्द्र सरकार के किसी दूसरे मंत्री की ओर से पेट्रो-उत्पादों की कीमतों में की गई रिकॉर्ड-ब्रेकिंग वृद्धि को न्यायसंगत बनाने की दलील भी जल्द ही पेश कर दी जाए। जहां तक खुद जीएसटी का सवाल है तो अब तक जीएसटी का प्रबंधन सरकार के लिए एक कठिन पहेली साबित हुई है। आए दिन जीएसटी को लेकर जटिलताएं और कठिनाइयां नमूदार होती रही हैं और सरकार की ओर से दर्जनों बार नियमों में फेरबदल करने पड़े हैं। साथ ही कई तरह के व्यवसाय भी जीएसटी के बोझ को सहन नहीं कर पा रहे हैं।

जीएसटी लागू करते वक्त खुद प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि जीएसटी से उपभोक्ताओं को लाभ मिलेगा और महंगाई घटेगी, पर अंजाम तो अब तक उल्टा ही नजर आया है। लिहाजा, उन तमाम सतरंगी दावों को फिलहाल छोड़ भी दें, जो चार साल पहले प्रधानमंत्री ने मुल्क से किए थे, तो भी ये तीन यानी रुपए की लगातार गिरती कीमत, पेट्रो-उत्पादों की बढ़ती कीमत और कुप्रबंधन से भरा जीएसटी का सवाल ही मोदी सरकार के टाइटेनिक जहाज के लिए खतरनाक आईसटीप साबित हो सकते हैं।

मुमकिन है प्रधानमंत्री को 2019 के लिए कोई चुनौती नजर इसलिए भी नहीं आ रही क्योंकि उन्हें खुद से मुकाबले के लिए कोई चेहरा नहीं दिख रहा है। पर तारीख गवाह है कि अगर मुद्दे हावी हों, तो विकल्प तो खुद जनता खोज लेती है। साल 2004 में ही अटलजी के खिलाफ  कौन सा चेहरा चुनौती के तौर पर दिख रहा था। पर जनता ने विकल्प खोज लिया था।  
 

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