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तो सक्रिय हुई प्रियंका

Thursday, February 07, 2019 09:50 AM

प्रियंका गांधी ने औपचारिक तौर पर अपना पद संभाल लिया है।

- शिवेश गर्ग

तो प्रियंका गांधी ने औपचारिक तौर पर अपना पद संभाल लिया है। इससे पहले मंगलवार को दिल्ली की एक मलीन समझे जाने वाली बस्ती के लोगों से उनने मुलाकात कर अपनी सक्रियता का संकेत भी दे दिया है, पर दूसरी ओर उनकी सियासत को लेकर हलकों में अटकलों का दौर भी तेज है। तेज होती इन अटकलों की वजह प्रियंका की सियासत को लेकर सत्ताधारी भाजपा की प्रतिक्रिया भी है। भाजपा के नेताओं ने प्रियंका के बरक्स दी गई अपनी प्रतिक्रियाओं में प्रियंका गांधी को खारिज ही करते नजर आते हैं। आम तौर पर भाजपा नेताओं की ओर से दलील पेश की जा रही है कि अखबार और खबरिया चैनल प्रियंका गांधी की सियासत में एंट्री को बेवजह बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं जबकि जमीन पर जनता में उन्हें लेकर किसी तरह का उत्साह नजर नहीं आ रहा।

ऊपरी तौर पर भाजपा के नेता कुछ भी बयान दे रहे हों, पर जहां तक अपन समझ पाएं हैं प्रियंका को लेकर भाजपा के नेताओं में एक भय का माहौल है। भय इस बात का है कि आने वाले दिनों में अगर प्रियंका गांधी की सक्रियता बढ़ती है तो इसका नुकसान मुल्क भर में भाजपा को उठाना पड़ सकता है। यों तो इस भय की वजह के तमाम पहलू गिनाए जा सकते हैं, पर एक अटकल ने भाजपा के रणनीतिकारों को सबसे अधिक चिंतित कर रखा है वह यह कि कहीं प्रियंका वाराणसी से लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ही उम्मीदवार न बन जाएं। यह चिंता बेबुनियाद भी नहीं है क्योंकि सपा और बसपा ने सूबे की सीटों के आपसी बंटवारे में अमेठी और रायबरेली की दो सीटें गांधी परिवार के लिए छोड़ रखी हैं।

ऐसे में अगर प्रियंका गांधी वाराणसी से लोकसभा का चुनाव लड़ने का फैसला करती हैं तो मुमकिन है कि सपा और बसपा वाराणसी की तीसरी सीट भी प्रियंका के लिए खाली कर दें। ऐसी स्थिति में प्रियंका नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विपक्ष की एक सर्वमान्य उम्मीदवार के तौर पर उतारी जाएं। खुदा न खास्ता अगर ऐसा हो गया तो वाराणसी की सीट नरेन्द्र मोदी के लिए उतनी आसान नहीं रह जाएगी। और तब यह भी मुमकिन है कि इसका असर केवल बनारस ही नहीं अलबत्ता समूचे पूर्वी उत्तर प्रदेश में दिखने लगे और बनारस का चुनाव पूरे मुल्क में जेरे बहस बन जाए। हालांकि अब तक कांग्रेस आलाकमान की ओर से ऐसा किसी तरह का संकेत नहीं मिला है कि प्रियंका गांधी बनारस से चुनाव लड़ेंगी।

पर बनारस के गपोड़ इसे हकीकत मान कर चल रहे हैं। इस अटकल का सिलसिला भी बनारस की चाय-पान की दुकानों से ही निकला है। सियासत में अक्सर अटकलों को अमली जामा पहनते भी देखा गया है। जाहिर है कि प्रियंका गांधी की सियासत को लेकर जारी ऐसी अटकलें और बहस तमाम क्षेत्रीय दलों की तुलना में भाजपा के लिए ही नुकसानदेह साबित होगी। क्योंकि अव्वल तो क्षेत्रीय दलों के अपने स्थानीय सियासी मुद्दे हैं और मुद्दों से निपटना फिलहाल कांग्रेस के कूब्बत के बाहर की बात लगती है, और दूसरा यह कि क्षेत्रीय दलों में अधिकांश तो विपक्षी लामबंदी में कांग्रेस के साथ खड़े हैं या फिर आमचुनाव के बाद खड़े हो सकते हैं।

यानी कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह कि प्रियंका के निशाने पर क्षेत्रीय दल नहीं अलबत्ता, भाजपा होगी। फिर सवाल प्रियंका के मुकाबले भाजपा की चुनावी रणनीति का है। भाजपा ने दस साल सत्ता में रहने के बाद जिस आसानी से सोनिया गांधी और राहुल गांधी को 2014 में निशाने पर लिया था, प्रियंका के खिलाफ निशाना साधना उतना आसान नहीं होगा। भाजपा, प्रियंका के खिलाफ न तो विदेशी मूल का मुद्दा ही खड़ा कर सकती है और न ही उनके खिलाफ प्रचार की वैसी मुहिम ही चला पाने की हालत में जैसा कि वह राहुल गांधी के खिलाफ चला चुकी है।

प्रियंका के खिलाफ न तो ‘इटैलियन बहू’ सरीखा कोई इल्जाम ही चस्पा हो पाने की हालत में और न ही ‘पप्पू’ जैसा तमगा। दूसरी ओर, अगर अपनी शैली के मुताबिक नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने प्रियंका के खिलाफ चुनाव की सरगर्मी में हल्की बात कह दी, तो वे राहुल गांधी के उलट उसे भावनात्मक मसला बना सकती हैं। ऐसा करने का उन्हें अनुभव भी है। रायबरेली में जब सोनिया गांधी पहला चुनाव लड़ रही थीं तो प्रियंका गांधी की एक भावनात्मक अपील ने अरुण नेहरू जैसे कद्दावर नेता का मिट्टी पलीद कर दी थी। ले-देकर उनके पति राबर्ट वाड्रा का मामला बचता है।

पर जब भाजपा खुद ही वाड्रा के खिलाफ पांच साल के शासन में कुछ नहीं कर पाई, तो अब आगे यह संभावना नदारद ही है। क्योंकि अब राबर्ड वाड्रा पर भाजपा की ओर से किया गया हर हमला पॉलिटिकल वैंडेटा के तौर पर देखा जाएगा। गौर करने की बात है कि राहुल गांधी की सियासत को लेकर कभी भी राजीव गांधी या इंदिरा की सियासत को याद नहीं किया गया। पर प्रियंका अभी पूरी तरह सियासत में सक्रिय भी नहीं हुई हैं और पिता राजीव गांधी और दादी इंदिरा गांधी की कुर्बानी जनता की चर्चा में जगह बनाने लगी है। कहना गैरबाजिब नहीं कि प्रियंका की सियासी सक्रियता भाजपा के लिए तमाम मोर्चों पर मुश्किलें खड़ी करेंगी।
 

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