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महिलाओं में मोतियाबिंद होने का जोखिम ज्यादा: डॉ. गोयल

Saturday, October 27, 2018 11:20 AM

जयपुर। प्रसिद्ध आॅप्थैलमोलॉजिस्ट और आनंद आई अस्पताल के निदेशक डॉ. सोनू गोयल के अनुसार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में मोतियाबिंद होने का जोखिम ज्यादा रहता है। भारत में मोतियाबिंद के मामलों के बारे में बात करते हुए डॉ. गोयल ने महिलाओं को मोतियाबिंद के जोखिमों के बारे में ज्यादा जागरूक होने और इसकी जल्द जांच के लिए नियमित तौर पर चेकअप कराने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि दुनियाभर में मोतियाबिंद के रोगियों में से करीब दो तिहाई या 61 फीसदी महिलाएं हैं, जिससे स्पष्ट है कि महिलाओं में मोतियाबिंद होने का जोखिम पुरुषों के मुकाबले अधिक होता है। उन्होंने कहा कि अक्सर आंखों से संबंधित समस्या पर किसी का ध्यान नहीं दिया जाता है और उसका इलाज नहीं हो पाता है।

गोयल ने कहा कि आज के समय में इंट्रा-आॅक्यूलर लेंसों के विभिन्न विकल्प उपलब्ध हैं, जैसे एक्स्टेंडेड रेंज आॅफ विजन इंट्रा आॅक्यूलर लेंसेस जो निकट, दूर और मध्यम दूरी के लिए उच्च गुणवत्ता की कंटीन्यूअस रेंज आॅफ  विजन देता है। अक्सर इनके इस्तेमाल से सर्जरी के बाद करेक्टिव आई वियर पहनने की जरूरत घट जाती है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश की प्रत्येक महिला की पहुंच इस प्रकार के एडवांस्ड गुणवत्ता के इलाज तक हो।

अधिक जोखिम के कई कारण
महिलाओं में मोतियाबिंद होने के अधिक जोखिम की कई वजह हैं। औसतन महिलाओं का जीवनकाल पुरुषों के मुकाबले अधिक होता है, जिससे उन्हें बढ़ती उम्र से संबंधित बीमारियां जिसमें आंख से संबंधित बीमारियां भी शामिल हैं होने का जोखिम बढ़ जाता है। अन्य अध्ययनों में खुलासा हुआ है कि मासिक धर्म समाप्त होने के बाद शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर घटने लगता है, जिससे भी महिलाओं में मोतियाबिंद होने की आशंका बढ़ जाती है। भारत पर केंद्रित अध्ययनों में सामने आया है कि जैविक ईंधन से खाना पकाने वाली महिलाओं में मोतियाबिंद होने की आशंका अधिक रहती है। घर में खाना पकाने का काम महिलाएं करती हैं, वह भी बिना चिमनी के स्टोव पर, जिससे उनकी आंखों में जैविक ईंधन के जलने से उठने वाला धुआं बड़ी मात्रा में जाता है।

यह दी सलाह
डॉ. गोयल की सलाह है कि महिलाओं को 40 वर्ष की होते ही अपनी आंखों की संपूर्ण जांच करानी चाहिए। इससे उन्हें होने वाली आंखों की ऐसी बीमारी का भी पता चल सकता है, जिसके लक्षण शुरुआती चरण में स्पष्ट नहीं दिखते हैं। लक्षणों को नजर अंदाज करना और अपने-आप कोई भी दवाई लेने से आंखों की बीमारी की जांच में और देर होती है और अक्सर समय पर जांच हो नहीं पाती, जिससे इलाज करना जटिल हो जाता है।

 

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