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चुनाव-2018

भाजपा की हल चाल पर अशोक गहलोत ने रखी नजर, कर्नाटक में ढह गया 'केसरिया किला'

Saturday, May 19, 2018 17:45 PM

कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी के साथ रोड शो करते हुए अशोक गहलोत (फाइल फोटो)

बेंगलुरु। कर्नाटक में सियासी तौर पर भाजपा को पटखनी देकर कांग्रेस-जेडीएस खेमे में खुशी की लहर है। 15 मई को कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने, फिर कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की घोषणा और इसके बाद इस गठबंधन के नेता एचडी कुमारस्वीमा द्वारा राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने के लिए राज्यपाल को विधायकों के समर्थन की चिट्ठी सौंपना, ये सब सियासी घटनाक्रम तेजी से चले, इन सबके पीछे राहुल गांधी के 'चाणक्य' अशोक गहलोत की कुशल रणनीति बताई जा रही है।


नतीजों के दिन से ही कर्नाटक के सियासी घटनाक्रम बदलते गए और गहलोत भी अपनी रणनीति बदलते चले गए। 16 मई को कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला ने जब राज्य के सबसे बड़े भाजपा को सरकार बनाने का न्योता दिया तो कांग्रेस ने 17 मई को येदियुरप्पा के होने वाले शपथग्रहण समारोह पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की, जिसे खारिज कर दिया गया। येदियुरप्पा के सीएम पद की शपथ लेने के बाद राज्यपाल ने उन्हें 15 दिन में बहुमत साबित करने का मौका दिया, जिसे कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे डाली। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए 19 मई की शाम को 4 बजे शक्ति परीक्षण करने के आदेश दे दिए, इसके बाद 19 मई को  कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और येदियुरप्पा ने विधानसभा में भाषण देते हुए सीएम पद से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया।

गहलोत ने कांग्रेस के 78 विधायकों को एकजुट रखने, बेंगलुरू से लेकर दिल्ली तक रणनीति तैयार कर हर वो कोशिश की, जिससे कांग्रेस मजबूत हो सके। गहलोत के साथ गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जन खड़गे सहित कई नेता भी सहयोगी के रूप में रहे। कर्नाटक में कांग्रेस के विधायकों को एकजुट रखने की बात हो, कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन का समय पर ऐलान करना और सुप्रीम कोर्ट में समय पर याचिका दाखिल करने की बात हो, इन सब कामों में बेशक डीके शिवकुमार, कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी, रणदीप सुरजेवाला, कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद से लेकर तमाम नेताओं का योगदान है, लेकिन किस सियासी चाल को कब चलना है, इसका 'निर्देशन' अशोक गहलोत ने किया, जिसका नतीजा यह निकला कि कर्नाटक में भाजपा सरकार का 'किला' मात्र ढाई दिन में ढह गया।

गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मजबूती देने के बाद यह दूसरा बड़ा मौका है जब गहलोत ने खुद को एक सुलझे हुए सियासी रणनीतिकार और राहुल गांधी के 'चाणक्य' के तौर पर मजबूती के साथ फिर साबित कर दिखाया। यह बात राहुल गांधी, सोनिया गांधी से लेकर पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता व देशभर के कार्यकर्ता भी जानते हैं। गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में राहुल की चुनावी रैलियों के प्रबंधन का काम भी गहलोत की कुशल निगरानी में ही हुआ, इससे कांग्रेस को नई ऊर्चा भी मिली है। 

बता दें कि अशोक गहलोत राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री हैं और वर्तमान में कांग्रेस के संगठन महासचिव हैं, कांग्रेस अध्यक्ष के बाद पार्टी में यह दूसरे नंबर का पद है, जो बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

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