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संपादकीय

वर्मा की वापसी

Friday, January 11, 2019 08:40 AM

आलोक वर्मा (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा को सीबीआई के निदेशक पद पर बहाल कर दिया है। लेकिन उन्हें नीतिगत फैसले लेने की फिलहाल अनुमति नहीं होगी। पिछले दिनों सरकार और केन्द्रीय सतर्कता आयोग, सीवीसी ने उन्हें आधी रात बाद सारे अधिकार लेकर उन्हें जबरन छुट्टी पर भेज दिया था जिसे अदालत ने उचित नहीं माना। वर्मा छुट्टी पर भेजने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अदालत के इस फैसले से सरकार को निश्चित ही करारा झटका लगा है। हालांकि अदालत ने यह भी फैसला सुनाया है कि उनके पद पर बने रहने के बारे में चयन समिति एक हफ्ते में फैसला करे। पहले उन्हें बिना चयन समिति की राय के ही छुट्टी पर भेजने का जबरन आदेश दिया गया था।

इस फैसले से मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल जरूर खड़ा हुआ है, लेकिन यह फैसला न तो बतौर सीबीआई जैसी संस्था की साख बहाल जैसी संस्था की साख बहाल करने वाला है और न ही सीबीआई प्रमुख की। इस फैसले की ऐसी कोई व्याख्या करना कठिन है कि इससे सीबीआई प्रमुख सही साबित हुए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नीतिगत या संस्थागत फैसला नहीं लेने की हिदायत भी है। उन्हें चयन समिति निर्णय लेकर एक हफ्ते में अधिकारों के संबंध में फैसला करेगी। सीबीआई प्रमुख पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और अदालत दो महीने में भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों पर कोई विचार नहीं कर सका। आरोपों की जांच का जिम्मा फिर सीवीसी के हाथों में सौंप दिया गया है।

इस मामले में अदालत से एक सवाल यह भी किया जा सकता है कि आखिर इस मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी थी तो फिर इसे काफी दिनों तक सुरक्षित रखने की क्या जरूरत थी, क्योंकि आलोक वर्मा तो आखिर इसी माह के अंत तक सेवा निवृत्त होने वाले हैं? सुप्रीम कोर्ट ने तो सिर्फ उन्हें जबरन छुट्टी पर भेजने की प्रक्रिया को गलत बताया है। अदालत का मत है कि वर्मा को हटाने या छुट्टी पर भेजने का निर्णय उसे नियुक्त करने वाली उच्च स्तरीय को करना चाहिए था। अदालत के इस फैसले से सरकार को सबक मिलने के साथ ही भविष्य के लिए एक  नजीर तो बन गई, लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं मिला कि अगर सीबीआई प्रमुख किसी मामले में पकड़ी जाए या उन पर भ्रष्टाचार आदि के आरोप लगे तो क्या सरकार को पहले उसे नियुक्त करने वाली समिति के पास ही जाना चाहिए।

सवाल यह भी है कि आखिर ऐसी किसी स्थिति में सीबीआई के कामकाज पर निगरानी करने वाले केन्द्रीय सतर्कता आयोग की क्या भूमिका होगी? बहरहाल, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सीबीआई जैसी संस्था में दो उच्च अधिकारी सीबीआई की साख पर बट्टा लगाने की हदों को पार कर जाएं तो आखिर सरकार मौन होकर अथवा आंखें बंद कर नहीं बैठी रह सकती। और सरकार को ऐसा होने भी नहीं देना चाहिए। निदेशक वर्मा व विशेष निदेशक आलोक-अस्थाना के बीच आरोप-प्रत्यारोप छिड़ी जंग जब सार्वजनिक होने लगी तो सरकार ने दोनों को पदों से हटाने का उचित ही फैसला लिया था। उस वक्त उस आदेश को क्षेत्राधिकार का सवाल नहीं बनाया जाना चाहिए था।

सीबीआई जैसी संस्था के प्रमुख का कार्यकाल तय करना सर्वथा उचित है, लेकिन अगर कोई अधिकारी गंभीर आरोपों में घिर जाए या फिर किसी मामले में पकड़ा जाए तो फिर उसे पद से हटाने की कोई आसान प्रक्रिया या अधिकार भी सरकार के पास होना चाहिए। अगर उसे नियुक्त करने वाली समिति में कोई आम राय न बने तो क्या ऐसे अधिकारियों को पद पर बने रहने का कोई अधिकार बनता है? आखिर सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्मा की बहाली का आदेश देते हुए उन पर पूरा विश्वास व्यक्त नहीं किया है। उन्हें नीतिगत फैसलों से वंचित रखा गया है। अब उच्च स्तरीय समिति वर्मा के बारे में जो भी फैसला ले, लेकिन जरूरी तो यह है कि सीबीआई एक विश्वसनीय संस्था बनी रही और उसकी साख कायम रहे।

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