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Thursday 17th of January 2019
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संपादकीय

चौंकाने वाली रिपोर्ट

Saturday, January 12, 2019 10:15 AM

ब्रिटेन में हैरियट-वॉट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने हाल ही अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि हर बार जब हम खाना खाने बैठते हैं, भोजन के साथ हमारे पेट में प्लास्टिक के सौ से ज्यादा सूक्ष्म कण पहुंच जाते हैं। यह शोध रिपोर्ट सचमुच चौंकाने वाली है। कभी-कभी जब आवारा गायों के पेट से प्लास्टिक निकलने की खबरें आती हैं, तब या तो हम उन लोगों को कोसते हैं, जो अपना कूड़ा प्लास्टिक की थैलियों में डालकर फेंक देते हैं या फिर उस व्यवस्था को, जो गायों को आवारा इधर-उधर खाने के लिए छोड़ देती है। नए शोध बताते हैं कि प्लास्टिक सिर्फ गाय जैसे आवारा पशुओं के पेट में ही नहीं जा रहा, हमारे जैसे उन लोगों के पेट में भी जा रहा है, जो साफ -सफाई से खाना पसंद करते हैं।

इन शोधकर्ताओं ने एक बार प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाली पेट्री डिश में ऐसे कण देखे, तो उन्होंने सोचा कि भोजन की थाली में ऐसे कितने कण होते होंगे, जो काफी बड़ी होती है। यह शोध उसके बाद ही शुरू हुआ। शोधकर्ताओं ने गणना की, तो पता चला कि एक पेट्री डिश में अगर प्लास्टिक के 20 कण होते हैं, तो भोजन की बड़ी थाली में औसतन 114 कण। इन शोधकर्ताओं ने जब इस गणना को आगे बढ़ाया, तो वे इस नतीजे पर पहुंचे कि ब्रिटेन में एक व्यक्ति हर साल औसतन 68415 प्लास्टिक के सूक्ष्म कण निगल जाता है। अगर इस गणना को और आगे बढ़ाया जाए, तो पता चलेगा कि हम अपने शरीर की हर मांसपेशी के लिए प्लास्टिक के दो सूक्ष्म कण हर साल निगल जाते हैं।

वैसे पिछले दिनों एक खबर यह भी आई थी कि समुद्री जीवों के शरीर में इतना प्लास्टिक हो गया है कि जो लोग सी-फूड खाते हैं, वह उनके शरीर में भी पहुंच जाता है। ऐसा नहीं है कि प्लास्टिक के कण सिर्फ भोजन के जरिए ही हमारे शरीर में पहुंचते हैं। प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण हमारे वातावरण में हर जगह पहुंच गए हैं, इसलिए जब हम सांस लेते हैं, तो वे हमारे फेफड़ों में भी जा विराजते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि हमारे घरों में जो धूल होती है, उसमें प्लास्टिक के ये कण बहुतायत में होते हैं। प्लास्टिक के ये कण कहीं से भी आ सकते हैं।

वे हमारी दरी या कालीन में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के भी हो सकते हैं, कार-टायर के भी हो सकते हैं, पैकेजिंग के भी हो सकते हैं, हमारी कुर्सी, सोफे, यहां तक कि हमारे कपड़ों के भी हो सकते हैं। हम उन्हें देख नहीं पाते, लेकिन वे हमारी खुराक का नियमित हिस्सा बन चुके हैं।  प्लास्टिक के ये नन्हे कण हमारे शरीर, हमारी सेहत को क्या नुकसान पहुंचाते हैं, यह अभी ठीक से नहीं पता, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि हमारा पूरा शरीर और उसका पूरा रसायनशास्त्र प्रकृति से मिलने वाले कार्बनिक पदार्थों को खाने-पचाने के लिए ही बना है।

इसलिए यह उम्मीद तो नहीं ही है कि प्लास्टिक के ये कण शरीर में पहुंचकर कोई अच्छी भूमिका निभाते होंगे। और समस्या सिर्फ प्लास्टिक की नहीं है, हमने तरह-तरह के सिंथेटिक डिटर्जेंट और रसायन बनाए हैं, जिन्हें हम हर रोज इस्तेमाल करते हैं और उनके अंश भी हमारे शरीर में नियमित रूप से पहुंच रहे हैं। दुर्भाग्य से शरीर पर इनके प्रभाव का भी अभी ठीक से शोध नहीं हो सका है। हमें नहीं पता कि ये हमें कौन सी बीमारी देते हैं और हमारी किन परेशानियों का कारण बनते हैं? यह ऐसा मामला है, जिसका समाधान सिर्फ प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल बंद कर देने से भी नहीं निकलने वाला।

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