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संपादकीय

अयोध्या की राह

Monday, January 07, 2019 08:00 AM

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई एक बार फिर टाल दी। मगर, इस बार सुनवाई एक सप्ताह ही टली है, जबकि पिछली बार करीब दो महीने के लिए इस आधार पर टाली गई थी कि नई पीठ का गठन किया जाना है। कोई नहीं जानता कि अभी तक इसका गठन क्यों नहीं हो पाया? अब कहा गया है कि 10 जनवरी को उपयुक्त तीन सदस्यीय पीठ सुनवाई करेगी। अब देखना है कि नई पीठ अयोध्या मामले की सुनवाई नियमित करती है या फिर तारीख दर तारीख का सिलसिला जारी रखती है। हालात जैसे भी रहे हों, लेकिन पिछले आठ साल में इस मामले का निपटारा न हो पाने से लोगों का धैर्य टूट रहा है

और असंतोष भी बढ़ रहा है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आखिर करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े इस मामले को प्राथमिकता से क्यों लिया जा रहा है? लेकिन समझने की बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद भूमि के मालिकाना विवाद पर विचार कर रहा है। मंदिर या मस्जिद निर्माण पर फैसला नहीं आने वाला है। अदालत के सामने यह मामला सिविल मुकदमा के तौर पर है। मामले की प्रतिदिन सुनवाई की याचिका अदालत के समक्ष है, फिलहाल तो इस पर गौर नहीं किया गया है, लेकिन 10 जनवरी की पीठ ही कोई उचित निर्णय करेगी। प्रतिदिन सुनवाई की याचिका मंजूर नहीं की जाती है तो मोदी सरकार एवं भाजपा के लिए समस्या खड़ी होगी।

क्योंकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विहिप एवं साधु-संत ही नहीं भाजपा के परम्परागत समर्थक भी चाहते हैं कि सरकार कानून बनाकर या अध्यादेश लाकर जमीन मंदिर निर्माण के लिए सौंप दे। पता नहीं सरकार ने इस मांग पर कोई कानूनी राय अभी तक ली है अथवा नहीं, लेकिन पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने अपने एक साक्षात्कार में कहा कि मामला अदालत में लंबित है हमें फैसले की प्रतीक्षा करनी होगी। अब अदालत का रुख तो लगता है कि वह इसे सिविल मामला मानकर चल रही है और ऐसे मामलों की सुनवाई और फैसला आने में काफी वक्त ही लगता है।

फिर फैसला यदि मंदिर निर्माण के अनुकूल नहीं आया तो क्या होगा? अयोध्या विवाद खासा लंबा खिंच गया है। 1992 में 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ढहा देने के बाद से यह विवाद जारी है और इसमें कानूनी विवाद के साथ-साथ राजनीति भी जारी है। अदालती विवाद ने 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद नया रूख लिया। हाईकोर्ट ने विवादित जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच समान रूप से बांटने का आदेश दिया, जो किसी पक्ष को मंजूर नहीं हुआ। तीनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट चले गए। कुछ महीनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को विवाद पर आम सहमति बनाकर रास्ता निकालने की सलाह दी, लेकिन कोई सहमति नहीं बन सकी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाले पक्षकारों को अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए। यदि नहीं तो बेहतर यही होगा कि जो मुस्लिम संगठन अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के पक्ष में हैं उन्हें साथ लेकर आपसी सहमति कायम की जाए। क्योंकि अदालत का फैसला जिस पक्ष के भी खिलाफ आएगा वह आहत होगा। इससे सामाजिक सद्भाव को क्षति भी पहुंच सकती है।

यही सही उपाय है कि आपसी सहमति से समाधान की राह निकाली जाए। अन्यथा अदालत को जल्द फैसले का रूख अपनाना चाहिए ताकि साम्प्रदायिक विद्वेष एवं राजनीतिक लाभ उठाने की स्थिति खत्म हो। केन्द्र सरकार को अदालत में प्रतिदिन की सुनवाई की दमदार अपील करनी चाहिए।
 

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