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Sunday 17th of February 2019
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संपादकीय

फिर रेल हादसा

Wednesday, February 06, 2019 09:35 AM

बिहार के वैशाली जिले में जोगबनी-आनंद-विहार सीमांचल एक्सप्रेस हादसे पर रेल विभाग को गंभीरता से मंथन करने की जरूरत है। इस हादसे से एक बार फिर यही जाहिर हो रहा है कि रेल मंत्रालय रेल सुरक्षा पर समुचित ध्यान नहीं दे रहा है और मात्र दावों से काम चला रहा है। हाल ही में पीयुष गोयल ने अंतरिम बजट पेश करते हुए दावा किया था कि पिछले साल में रेल हादसों पर काफी हद तक अंकुश लगा है, लेकिन उनके इस दावे के दो दिन बाद ही सीमांचल एक्सप्रेस के ग्यारह डिब्बे रविवार की तड़के सुबह चार बजे के करीब पटरी से उतर गए और इसमें सात यात्रियों की मौत हो गई और करीब तीस से अधिक लोग घायल हो गए।

दुर्घटना के कारणों का अभी ठीक-ठाक पता नहीं चला है लेकिन शुरूआती जांच में बताया गया है कि रेल की पटरी में दरार आ गई थी। कैसे दरार आई और क्यों आई, इसका जवाब नहीं दिया गया है। फिर यह समझना मुश्किल है कि पटरियों की निगरानी करने वाली टीम को ऐसी दरार की जानकारी कैसे नहीं मिली? निगरानी टीम तो नियमित रूप से पटरियों की जांच को निकलता है। ऐसे में यदि पटरी कहीं से कमजोर लग रही थी या जमीन धसक गई थी तो टीम ने उसे दुरूस्त क्यों नहीं किया? कई बार तेज गति की ट्रेनों के गुजरने की वजह से पटरियों की नीचे की पट्टियां धसक जाती हैं, कई बार पटरियों को जोड़े रखने वाले नट-बोल्ट ढीले पड़ जाती हैं।

अगर समय रहते उसे दुरूस्त न किया जाए तो यह हादसे की वजह बन जाते है। अगर इस कारण से सीमांचल एक्सप्रेस दुर्घटनाग्र्रस्त हुई तो यह गंभीर लापरवाही का मामला बन जाता है। कई बार ऐसी दुर्घटनाओं के लिए असामाजिक तत्वों पर भी संदेह व्यक्त किया जाता है। देश में ऐसा संभव भी हो सकता है, लेकिन विभाग को इससे निपटने के उपाय भी करने चाहिए और इसकी गहरी जांच करके ऐसे तत्वों को कड़ा दण्ड दिलाया जाना चाहिए। सीमांचल एक्सप्रेस जैसा कोई पहला हादसा नहीं है। हर साल ऐसी दो-तीन बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं। पिछले दस महीनों में तो यह पांचवां बड़ा हादसा है। इसके अलावा छोटे-मोटे रेल हादसे तो आए दिन होते ही रहते हैं।

कई बार मानव रहित फाटकों पर हादसे हो जाते हैं और लोग मर जाते हैं। पिछले चार साल पर नजर डालें तो रेल हादसों की तादाद काफी रही है। फिर भी रेल विभाग हादसों पर काबू पाने में विफल रहा। ज्यादातर रेल हादसे कर्मचारियों की लापरवाही की वजह से भी हुए हैं। इन रेल हादसों को लेकर रेल महकमा यह दलील भी देता है कि रेल पटरियों का सुधार काम तेजी से चल रहा है और इसी बीच रेलों को गुजारना भी पड़ता है तो कभी-कभार हादसे हो जाते हैं। यह दलील आश्वस्त करने वाली नहीं है। सरकार के बड़े-बड़े दावों के बावजूद पटरी पर हादसे हो रहे हैं तो इसे क्या माना जाए? दावे तो हकीकत में दिखने चाहिए। मोदी सरकार रेलवे को विश्व श्रेणी में खड़ा करने का दावा करती है।

तेज रफ्तार वाली गाड़ियां चलाने के दावे किए जा रहे हैं। बुलेट ट्रेन परियोजना पर काम चल रहा है। लेकिन जब तक रेल पटरियां विश्व मानकों के अनुरूप नहीं होंगी और पटरियों को विश्वसनीय नहीं बनाया जाएगा, तब तक हमारी रेल विश्व स्तर पर कैसे खरी उतरेगी? हमें रेल सेवाओं व सुरक्षा को विश्व स्तरीय दर्जा दिलावा है तो आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ाना होगा। इसमें विलंब होगा तो रेल हादसों को भी नहीं रोका जा सकेगा।

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