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संपादकीय

कोई सबक नहीं!

Wednesday, January 02, 2019 08:00 AM

घालय की एक कोयला खदान में पिछले दो हफ्ते से भी ज्यादा दिनों से पन्द्रह मजदूर फंसे हैं, लेकिन हम उन्हें बाहर निकालने और बचाने के अब तक के प्रयासों में विफल ही रहे हैं। ये मजदूर 13 दिसंबर से खदान में फंसे हैं तो अब उनके जिन्दा बचने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। ऐसी यह कोई पहली घटना नहीं है, यह देश तो कई हादसों से गुजरा है, लेकिन हमारी प्रशासनिक व्यवस्थाओं व सरकारों ने कोई सबक तक नहीं सीखा है। हादसे होते हैं तो बचाव व राहत कार्यों में ढिलाई और नाकामी आम हो चली है।

मेघालय खदान हादसा भी पूरी तरह से प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही व अनदेखी का ही नतीजा है। हमारी केन्द्र से लेकर राज्य की सरकारें विकास की बातें और दावे तो खूब करती हैं, लेकिन ऐसे दावे तब खोखले साबित होते हैं, जब हम हादसों से निपटने तथा राहत अभियानों में पिछड़े नजर आते हैं। हमारा देश खनिज सम्पदा से सम्पन्न है, लेकिन खेदजनक है कि खनन संबंधी पूरे संसाधन और हादसों के समय बचाव अभियान की पुख्ता और कारगर व्यवस्था का तंत्र खड़ा नहीं कर पाए हैं। मेघालय में खदान में फंसे मजदूरों के बचाव के लिए अब दो सप्ताह बाद कहा जा रहा है

कि नौ सेना की मदद से बचाव कार्य तेज किया जाएगा। इस बचाव का औचित्य क्या रह जाएगा? खदान में पानी भरा है और अभी तो नौसेना भी पानी की गहराई का पता नहीं लगा पाई है। अनुमान है पानी काफी गहरा है और सेना के गौताखोर सौ फुट की गहराई तक ही जा सकते हैं। आज से कोई 43 साल पहले दिसंबर 1975 में धनबाद की कोयला खदान में 375 लोग की मौत हुई थी। एक बड़े जल भण्डार का पानी खदान की छत पर बने एक छेद से खदान के पानी अंदर जा रहा था। जिसकी शिकायत के बावजूद उसे रोकने की चिंता नहीं की गई।

नतीजन यह लापरवाही दुर्भाग्यपूर्ण बड़ी घटना बन गई। इतिहास का काला अध्याय बनने के बावजूद भी सरकारों व प्रशासन ने कोई सबक नहीं सिखा है तो खदान हादसे भविष्य में भी होते रहेंगे और मेघालय जैसे हादसे भी होते रहेंगे। मेघालय में खदान में भरा पानी बाहर निकालने की पूरी व्यवस्था होती तो मजदूरों की जान बचाई जा सकती थी। व्यवस्था करने में मेघालय की सरकार पूरी तरह लापरवाह रही और केन्द्र ने भी कोई गंभीरता नहीं दिखाई। सूत्रों का कहना है कि ईस्ट जयंतिया हिल्स में अवैध रूप से कोयले का खनन किया जा रहा था।

प्रतिबंध के बावजूद मेघालय में खनिजों के खनन का काम होता है। नि:संदेह खनन माफिया व प्रशासनिक तंत्र के बीच कोई मिलीभगत है और माफिया को सरकारी संरक्षण प्राप्त है। आखिर लगभग 370 फुट गहरी यह खदान कोई रातों-रात तो नहीं खुदी होगी। फिर चार साल पहले मेघालय में कोयला खनन पर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने प्रतिबंध लगा दिया था फिर कोयला खनन सरकार के सामने सवाल खड़ा करता है। इस अनदेखी का ही नतीजा है कि यह हादसा हुआ गरीब मजदूरों की जिन्दगी को खतरा पैदा हो गया। यह हादसा हमें यह याद दिलाता है

कि हमें खनन कार्य के क्षेत्र में आगे काफी कुछ करना है। हमें थाईलैंड जैसे देश में पिछले दिनों घटी एक घटना से भी कुछ सीख लेनी चाहिए। वहां एक गुफा में फंसी फुटबाल टीम को बचा लिया गया। राहत टीम के पास गुफा का नक्शा था और फंसी टीम के लोग भी प्रशिक्षित थे। फिर वहां की सरकार ने अपने प्रयासों के साथ-साथ विदेशों से भी तुरंत मदद मांगी। मेघालय की सरकार ने किसी से कोई मदद नहीं मांगी। मूक दर्शक बैठी रही। बचाव और राहत अभियान काफी विलंब से शुरू हुआ। उम्मीद तो नहीं है फंसे मजदूर बचे होंगे, लेकिन किसी चमत्कार की उम्मीद की जा सकती।

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