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संपादकीय

हसीना की वापसी

Thursday, January 03, 2019 10:05 AM

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना (फाइल फोटो)

बंग्लादेश में जातीय संसद (नेशनल असेंबली) के चुनावी नतीजे सामने आ चुके हैं जो अप्रत्याशित हैं। सत्ताधारी अवामी लीग की वापसी के ठोस आधार तो थे, लेकिन परिणाम इस कदर एक तरफा होंगे, शायद कम लोगों ने सोचा होगा। जातीय संसद की कुल 300 सीटों में से 299 सीटों पर चुनाव हुए थे, जिसमें अवामी लीग की अगुवाई वाला महाजोट यानी-ग्र्रैंड अलायंस 288 सीटें जीतने में कामयाब हुआ। वही मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेतृत्व वाले जातीय ओइक्को फ्रंट (नेशनल यूनिटी फ्रंट) महज सात सीटें ही जीत सका। बहरहाल, नतीजों के बाद की इस बड़ी जीत के साथ लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने वाली शेख हसीना बांग्लादेश की पहली राजनेता हैं।

प्रमुख विपक्षी पार्टियां अब चुनावों में धांधली का आरोप लगा रहा हैं और न्यायिक निगरानी में दुबारा चुनाव की मांग कर रहे हैं। जातीय ओइक्यो फ्रंट के संयोजक डॉ. कमाल हुसैन और बीएनपी महासचिव मिर्जा फखरूल इस्लाम ने कहा है कि नतीजे विश्वसनीय कतई नहीं माने जा सकते। विपक्षी दल चाहे जो कहें, लेकिन जनादेश को नकारा नहीं जा सकता। हसीना को राष्ट्रीय चुनावों में मिली एक तरफा जीत बताती है कि उनकी राजनीतिक- आर्थिक नीतियां जनपक्षीय हैं। लिहाजा आम मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता कायम है। जनता ने कट्टरपंथी पार्टियों और उनकी नीतियों को पूरी तरह नकार दिया है। हसीना की नीतियों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है

और देश का सामाजिक विकास भी हुआ है। अगर सामाजिक-आर्थिक विकास इसी तरह होता रहा तो बांग्लादेश 2024 में विकासशील देशों के समूह में शामिल हो जाएगा। हसीना की सत्ता में वापसी भारत के लिए सकारात्मक है। उनके कार्यकाल में नई दिल्ली और ढाका के बीच ढांचागत संरचना, ऊर्जा, रेलवे, शिक्षा, सुरक्षा और जन सम्पर्क के क्षेत्रों में सहयोग और साझेदारियां बढ़ी हैं। अगले आम चुनाव में भारत में चाहे जिसकी सरकार बने, नई दिल्ली व ढाका के बीच रिश्ते यथावत बने रहने की पूरी उम्मीद है। वैसे अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगुवाई में पुन: एनडीए की सरकार बनती है तो निश्चित रूप में भारत-बांग्लादेश के बीच आपस और व्यापारिक रिश्तों में और तेजी की उम्मीद है।

साथ ही तीस्ता जल बंटवारे समेत अन्य विवादित मुद्दे भी सुलझने की उम्मीद है। खुशी की बात तो यह है कि अवामी लीग के शासन में अल्पसंख्यक हिन्दू खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। लेकिन वेस्टेड प्रॉपर्टी एक्स (पूर्व में शत्रु सम्पत्ति कानून) वहां रहने वाले हिन्दुओं के लिए किसी काले कानून से कम नहीं है। 1965 में पूर्वी पाकिस्तान में शत्रु सम्पत्ति अधिनियम बना था। बीएनपी और जमात के शासन में अल्पसंख्यकों की जमीनों पर कब्जे हुए। हसीना सरकार आज तक अल्पसंख्यकों को न्याय नहीं दिला पाई है। इस बार उम्मीद है कि सरकार कुछ राहत दिलाने के कदम उठाए क्योंकि हसीना की पार्टी को हमेशा ही अल्पसंख्यकों का समर्थन रहा है। वैसे हसीना की बड़ी जीत के साथ-साथ उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रहेगी कि सत्ता को निरंकुश होने से बचाना। कई बार ऐसी जीत राजनेताओं में निरंकुशता पैदा कर देती है।

उन्हें ऐसी सरकार चलानी जो कानून के शासन, नागरिकों के बुनियादी अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं के सम्मान की रक्षा कर सके। निश्चित तौर बांग्लादेश में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है। लेकिन चुनावों में भारी हिंसा चिंतनीय है। भारी सुरक्षा इंतजामों के बाद हिंसा का होना और मतदान के दौरान धांधलियों की काफी शिकायतें आना चिंतनीय है। इसमें सुधार की जरूरत होगी। शेख हसीना की वापसी का भारत के लिए स्वागत योग्य है।

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