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संपादकीय

अयोध्या मामले पर सरकार की पहल

Saturday, February 02, 2019 09:50 AM

अयोध्या में गैर विवादित जमीन मूल मालिकों को लौटाने की मंशा से केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अर्जी दायर कर चुनाव पूर्व का एक बड़ा दांव खेलने की कोशिश की है। केन्द्र ने अदालत को बताया है कि सरकार ने निश्चित क्षेत्र एक्ट, 1993 के तहत अयोध्या में 67.7 एकड़ भूमि का अधिग्र्रहण किया था। इसमें वह हिस्सा भी शामिल था जिस पर विवादित ढांचा था। केन्द्र का मानना है कि जब विवाद सिर्फ 0.313 एकड़ जमीन पर है, जहां कभी बाबरी मस्जिद अवस्थित थी तो इससे अतिरिक्त भूमि उनके अधिकृत मालिकों को लौटा दिया जाना चाहिए। राम जन्म भूमि ट्रस्ट ने भी अपनी 42 एकड़ भूमि वापस लेने के लिए याचिका दे रखी है।

अब देखना है कि केन्द्र सरकार की अर्जी पर अदालत क्या फैसला देती है। यह एक हकीकत है कि नरसिंह राव सरकार ने 1993 में अयोध्या कानून के तहत विवादास्पद स्थल के चारों ओर की ये जमीनें इसलिए अधिगृहित की थी ताकि वहां किसी प्रकार की ऐसी गतिविधि न हो जिससे तनाव पैदा हो सके। गौरतलब है कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद मामले से निपटने के लिए कुछ कदम जरूरी थे। डर इस बात का था कि कहीं मंदिर निर्माण की कोशिश न हो जाए। आज उन हालातों को काफी समय बीत गया है। भूमि संबंधी विवाद सुप्रीम कोर्ट में भी गया था और अदालत ने अधिग्र्रहण को सही ठहराया था। साथ ही यह भी कहा था कि जिनकी जमीनें हैं उनको वापस मिल सकती है, लेकिन पक्षकारों को इसके लिए अर्जी दायर करनी होगी। इसमें से 42 एकड़ जमीन राम जन्म भूमि न्यास की है

जिसका गठन मंदिर निर्माण के लिए किया गया था। न्यास ने इसके पहले 1996 में सरकार से जमीन की मांग की थी, लेकिन सरकार ने न्यास की मांग को नहीं माना। वर्तमान में मंदिर निर्माण का मामला काफी गरमाया हुआ है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, साधु-संत समाज और हिन्दुत्ववादी संयुक्त रूप से सरकार से मंदिर बनाने का रास्ता साफ करने की मांग कर रहे हैं। पिछले दिनों तो सरकार से इसके लिए विधेयक लाकर नया कानून बनाने या फिर अध्यादेश लाने तक की मांग की गई थी। लेकिन इस मांग पर मोदी सरकार मौन रही, लेकिन आखिर एक टीवी साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी ने मंदिर मामले में कहा कि सरकार पहले न्यायिक फैसले का इंतजार करेगी।

फैसले के बाद ही कोई कदम उठाया जाएगा। लेकिन अयोध्या मामले की सुनवाई 29 जनवरी को भी टलने के बाद केन्द्र सरकार ने अविवादित जमीन वापसी की अदालत से मांग की है। सरकार मंदिर-निर्माण पर कानून बनाना नहीं चाहती, क्योंकि यह काम इतना आसान नहीं है। कोई कानून बनेगा तो भी अदालत उसकी समीक्षा करने को स्वतंत्र है। लेकिन सरकार को आखिर लोकसभा चुनाव के मद्देनजर और संघ आदि संगठनों की नाराजगी के चलते हुए अयोध्या मामले में कोई तो पहल करनी ही थी, जो अब जाकर की गई है। विहिपी ने इस पहल का स्वागत भी किया है।

वैसे विचार किया जाए तो जाहिर होता है कि जिसे विवादास्पद भूमि कहते हैं उसका रकवा केवल 0.313 एकड़ ही है, 2.77 एकड़ नहीं तो फिर जमीन संबंधी मामले को इतने लंबे समय तक बनाए रखने का क्या औचित्य था? सरकार यह पहल तो काफी पहले भी कर सकती थी। सरकार की दलील सही है कि जब उसने जमीन का अधिग्र्रहण किया था तो उसे वापस लौटाने का हक भी उसके पास होना चाहिए, लेकिन अब अदालत के जरिए हक लेने की कोशिश एक दो सवाल खड़े करती है। सरकार की इस पहल अदालत स्वीकार करती है या नहीं और मंदिर समर्थक इसे कितना मानते हैं, यह देखने की बात होगी।

 

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