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संपादकीय

जानलेवा बुखार

Monday, February 04, 2019 09:05 AM

स्वाइन फ्लू का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। इस जानलेवा बुखार ने राजस्थान सहित हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु तेलंगाना में अपने पांव पसार रखे हैं। चकित करने वाली बात तो यह है कि उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी इलाकों में भी प्रकोप बना रखा है। इससे इस बात को समझने की जरूरत है कि इसे किसी प्रकार का मौसमी रोग न माना जाए।

स्वाइन फ्लू का प्रकोप इस हद तक फैलने से जाहिर होता है कि इससे बचाव के एहतियाती इंतजामों में खासा कमी है। देशभर में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं किस हद तक लापरवाही बरती रही हैं। उपलब्ध आंकड़ों के हिसाब से जनवरी के पहले तीन हफ्तों में ही देशभर में स्वाइन फ्लू के करीब 2 हजार आठ सौ से अधिक मामले सामने आ चुके हैं।

इनमें से काफी लोगों की मौत भी हो चुकी है। अकेले राजस्थान में मरीजों की तादाद डेढ़ हजार से भी अधिक है और अब नब्बे लोगों की मौत की भी खबर है। इसके अलावा दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों से मिले आंकड़ों के हिसाब से छह सौ से अधिक मरीज इसकी चपेट में है। जबकि पिछले साल सिर्फ आधे ही लोग इसकी चपेट में आए थे। इस साल दिल्ली में अभी तक पन्द्रह लोगों की मौत की खबर है। यह इसलिए क्योंकि दिल्ली महानगर है और अस्पतालों में जांच और इलाज की पूरी व्यवस्थाएं हैं। जहां-जहां चिकित्सा सुविधाएं पर्याप्त हैं, वहां मौतों का आंकड़ा कम ही रहता है। जैसे राजस्थान के जयपुर शहर में पीड़ितों की मौत की संख्या काफी आंकी गई है, लेकिन जिन इलाकों में चिकित्सा सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं वहां मौतों का आंकड़ा ज्यादा है।

राजस्थान ही नहीं बल्कि जिन-जिन राज्यों में चिकित्सा सेवाएं अपर्याप्त है वहां मौतों का आंकड़ा अधिक है। ऐसा नहीं है कि इस साल स्वाइन फ्लू ने एकाएक जोर पकड़ा है। पिछले कई सालों से कम कभी ज्यादा असर के साथ यह बुखार दिल्ली सहित कई राज्यों में इसका प्रकोप मण्डराता ही चला आ रहा है। कभी डेंगू कभी चिकनगुनिया तो कभी स्वाइन फ्लू क्रमवार चलते ही आ रहे हैं। यह काफी चिंता का विषय होते हुए भी सरकारी महकमे सतर्कता नहीं बरतते और चिकित्सा संबंध इंतजामों को पुख्ता नहीं बनाते। गौरतलब है कि सबसे पहले स्वाइन फ्लू की शुरूआत मैक्सिको में हुई थी, लेकिन पिछले सात-आठ सालों में इसने भारत जैसे कई देशों को अपनी चपेट में ले लिया।

हमारे देश में इसका सबसे ज्यादा असर 2010 में देखने को मिला था और करीब 20 हजार लोग इसकी चपेट में आ गए थे। प्रकोप से निपटने की हमारे यहां पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी, इसी वजह से करीब साढ़े सत्रह सौ लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन उसके बाद इस बीमारी के उभरने के मौसम व बचाव के उपायों आदि को लेकर तथ्य साफ हो चुके हैं, लेकिन लापरवाही बरतने में सुधार नहीं किया गया। इसकी पहचान व लक्षणों के प्रति अभी भी जागरूकता नहीं आई है। इसकी वजह से ही इसकी चपेट में आए कई मरीजों की जान चली जाती है।

इस मौसम में बुखार-जुकाम एक सामान्य बीमारी है लेकिन इनके साथ ही स्वाइन फ्लू के लक्षण समझना आसान भी नहीं है। जांच से पता चल पाता है कि यह स्वाइन फ्लू है। पहचान और जांच के अभाव में उचित इलाज समय पर नहीं होने से मरीज की हालत बिगड़ जाती है और फिर नियंत्रण आसान नहीं रह पाता। जरूरत इस बात की है कि मौसम की शुरूआत के साथ ही चिकित्सा इंतजामों को पुख्ता किया जाए।

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