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संपादकीय

भीड़ तंत्र की चुनौती

Tuesday, January 01, 2019 09:55 AM

यह एक विडंबना ही है कि बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश) में गोहत्या से खफा भीड़ ने जिस पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की गोली मारकर हत्या करने वाले आरोपी की गिरफ्तारी के दूसरे दिन ही राज्य के गाजीपुर में एक पुलिस का सिपाही भीड़ की हिंसा का शिकार बन गया। पुलिस कर्मी गाजीपुर में भीड़ के पथराव में घायल हो गया और आखिर उसकी मौत हो गई, जो एक प्रकार की हत्या ही मानी जाएगी। हालांकि इस मामले में 22 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन इस तरह की उन्मादी हिंसा अक्षम्य और अस्वीकार है। यह एक तरह से कानून को दी जाने वाली सीधी चुनौती है। यह कैसी अराजकता है कि  भीड़ अपनी मांगे मनवाने के बहाने पुलिस को ही निशाना बनाने पर तुल जाए? इस प्रकार की अराजकता को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, जो कानून-व्यवस्था को ही छिन्न-भिन्न करने पर उतारू हो जाए।

इस प्रकार की अराजकता को किसी भी हाल में रोकने की जरूरत है। ऐसा तभी संभव होगा जब कानून को अपने हाथ लेने वालों व पुलिस तथा सुरक्षा बलों पर हमला करने वाले दुस्साहसियों को सख्त से सख्त सजा दिलाने की व्यवस्था हो। जब ऐसे हमले होते हैं और पुलिस कर्मियों की मौतें होती हैं तो उस राज्य की सरकार की कानून-व्यवस्था पर स्वाभाविक ही सवाल खड़े होते हैं और विपक्षी दलों को इससे राजनीतिक मुद्दा भी मुफ्त ही मिल जाता है। लेकिन यह राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह हर दल के लिए गहरी चिंता का विषय है। माना कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा है, लेकिन राज्य में यदि महीने भर के भीतर दो पुलिस कर्मियों की हत्या होती तो चिंता पैदा करती है।

फिर ऐसा भी नहीं है कि पुलिस पर हमले केवल उत्तर प्रदेश में ही हुए हैं। हर राज्य में ऐसे हमले होते देखे गए हैं। इसलिए ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई के लिए हर राज्य की सरकारों को सजग और सतर्क रहने की जरूरत है। यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि हिंसा और उन्माद की आड़ लेकर पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका जाए। पिछले कुछ दिनों से धरना-प्रदर्शन करने के दौरान पुलिस को निशाना बनाने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। भीड़ की आड़ लेकर उन्मादी हिंसा फैलाने वालों को समझना होगा कि लोकतंत्र में उन्हें इसकी इजाजत नहीं है। गाजीपुर की घटना में यह सामने आया है कि पुलिस पर पथराव करने वालों ने आरक्षण की मांग को लेकर सड़क जाम कर रखी थी।

पुलिस ने जाम खुलवाने की कोशिश की तो उन पर पथराव शुरू कर दिया गया तथा कुछ लोगों ने पुलिस कर्मियों को पकड़कर उनकी पिटाई भी की। पुलिस कर्मी कानून का रखवाला होता है, यदि उन पर हमला होता है तो यह सीधे तौर पर शासन व्यवस्था को चुनौती है। ऐसी घटनाएं न केवल पुलिस फोर्स के लिए बल्कि सरकार के इकबाल के लिए भी यह स्थिति चिंताजनक है। मजबूत पुलिस दृढ़ सरकार की सरपरस्ती को परिलक्षित करती है।

हाल के कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश में भीड़ ज्यादा अराजक हो गई है, खासकर पुलिस के आगे भीड़ का हमलावर सीन यही साबित करता है कि आखिर कमजोर कौन हो गया है? सरकार या पुलिस तंत्र। भीड़ तंत्र पर काबू पाने के लिए पुलिस को अपनी कार्य प्रणाली बदलनी होगी। साथ ही सरकार को भी सख्त रूख अपनाना होगा।

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