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संपादकीय

राफेल पर संग्राम

Saturday, January 05, 2019 09:25 AM

राफेल विमान

बुधवार का दिन एक तरह से पूरी तरह ‘राफेल’ विमान सौदे के नाम रहा। लोकसभा में तय चर्चा के तहत कांग्र्रेस के राहुल गांधी ने पूर्ववत राफेल सौदे को घोटाला बताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधा आरोप लगाया। सत्तापक्ष की ओर से जवाब देते हुए वित्त मंत्री अरूण जेटली ने नाम लिए बगैर गांधी परिवार पर हमला बोलते हुए कहा कि कुछ लोग ऐसे हैं जो सिर्फ पैसों का गणित समझते हैं, देश की सुरक्षा के मुद्दों से उनका कोई लेना देना नहीं है। लोकसभा का सारा समय आरोप-प्रत्यारोपों और हंगामे के बीच बीत गया।

शाम को कांग्र्रेस ने एक प्रेस कांग्र्रेस में गोवा के मंत्री विश्वजीत राणे का एक आडियो क्लिप जारी कर मामले को नया रंग देने की कोशिश की तो राफेल से संबंधित इस क्लिप को राणे ने खारिज कर दिया। आडियो स्क्रिप्ट को कांग्र्रेस ने लोकसभा में पढ़ने की इजाजत मांगी लेकिन राहुल ने इसकी प्रामाणिकता की गारंटी लेने से इंकार कर दिया तो लोकसभा अध्यक्ष ने इस मामले को खारिज कर दिया। इसी बीच बुधवार को ही राफेल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार के लिए याचिकाकर्ता यशवंत सिन्हा, प्रशांत भूषण और अरूण शौरी के एक बार फिर अदालत में दस्तक दी और सरकार के खिलाफ अदालत को गुमराह करने का आरोप लगाया। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पूर्व में राफेल सौदे को क्लिन चिट दे चुका है।

आखिर सवाल पैदा यह होता है कि यदि विपक्ष को हंगामा ही करना था और केवल पुराने आरोप ही दोहराने थे तो राफेल पर बहस कराने का क्या नतीजा निकला? आखिर कुछ हासिल तो हुआ ही नहीं। जो नतीजा निकला उससे यह साफ यह हुआ कि कांग्र्रेस इस मसले को जितना ज्यादा खीचेंगी उतनी ही अधिक असहज होगी। बहस की मांग विपक्ष की ही थी और बहस के दौरान कांग्र्रेस तर्कों से भिन्न थी। बस सांसदों ने सदन में कागजी जहाज उड़ाना ही बेहतर समझा। संसद बहस के लिए है, उसकी नियमावली तथा मर्यादाएं हैं। उसका ध्यान कांग्र्रेस सहित सभी सांसदों को रखना चाहिए। जहां तक राफेल सौदे का मामला है तो राहुल गांधी वही सब बातें ही सदन में दोहराते नजर आए जो लंबे समय से दोहरा रहे हैं। इनमें से अनेक आरोप तो तथ्यों से परे है। राफेल सौदे से संबंधित कुछ तथ्य ऐसे हैं जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता और सरकार यह बात सुप्रीम कोर्ट तक को स्पष्ट कर चुकी है तो भी कांग्र्रेस समझने की कोशिश नहीं कर रही है।

लोकसभा में भी वित्त मंत्री जेटली ने तथ्यों से कांग्र्रेस को अवगत कराया लेकिन राहुल व कांग्र्रेस ने राफेल को एक मुद्दा बना लिया है जो शायद आम चुनाव तक चलेगा। सुप्रीम कोर्ट से राफेल सौदे को क्लीन चिट मिल चुकी है। साथ ही राफेल का निर्माण करने वाली मुख्य कंपनी दस्साल्ट ने आॅफसेट के तहत अनेक कंपनियों से साझेदारी की है और रिलायंस डिफेंस की उसमें से केवल 3 प्रतिशत की हिस्सेदारी है, तो फिर 30 हजार रुपया अनिल अंबानी की जेब में डालने के आरोप की क्या तुक बनती है? यह भी साफ हो गया है कि आॅफसेट की कुल रकम भी 30 हजार करोड़ रुपए नहीं है। केन्द्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट और राफेल निर्माता कंपनी के तथ्यों पर कांग्र्रेस और राहुल गांधी को भरोसा नहीं तो उनके आरोप भी कहां तक टिके रह सकते हैं, यह बात कांग्र्रेस को ही समझनी है।

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