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Thursday 20th of September 2018
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दिल से करें महिलाओं का सम्मान

$author    Neha Nirala

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है... उन महिलाओं का दिवस जिन्हें इस दिन के मायने तक नहीं मालूम... आज सुबह की ही बात है... बस यात्रा के दौरान एक महिलायात्री महिलादिवस से पूरी तरह से अनजान हाथ में पैसे लिए कंडक्टर से टिकिट लेने पहुंच गई... वो तो भला हो सहयात्रियों का जिन्होंने उसे आज महिला यात्रियों के लिए मुफ्त यात्रा के बारे में बताया। हर बार की तरह इस बार भी इन्हीं महिलाओं के उत्थान के लिए बड़ी- बड़ी घोषणाएं की जाएंगी,दावे किए जाएंगे पर क्या ज़मीनी हक़ीकत इन सबसे ज़रा भी मेल खाती है?1909 में पहली बार महिला दिवस मनाया गया और 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसे अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मान्यता दी, लेकिन तब से आज तक महिलाओं की स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं देखा गया है, महिलाएं इससे पहले भी अपना वजूद ढूंढ रही थीं और आज भी महिलाएं इसी कश्मकश में लगी हुई हैं। अगर किसी घरेलू महिला की ही बात की जाए, तो कहने को तो उसे बात- बात पर अपने काम से काम रखने, यानि घर- परिवार को संभालने की बात की जाती है... लेकिन जब वो अपने इसी काम को पूरे अधिकार के साथ करने की बात करती है तो पुरुषवादी समाज उसे वहां से भी बड़ी चतुराई से बेदखल कर देता है... मिसाल के तौर पर आज भी महिलाओं के इस काम को जिम्मेदारी का नाम देते हुए किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जाता... और ना ही देश की जीडीपी में इसे शामिल किया जाता है...
एक स्त्री भले ही अपना पूरा जीवन बगैर एक बार भी अपने बारे में सोचे अपने घर- परिवार को संवारने में लगा दे लेकिन इस सबके बाद भी वो अपना अस्तित्व नहीं खोज पाती... यहां फिल्म हिना का एक डायलॉग याद आ रहा है जो महिलाओं की स्थिति पर आज भी एकदम सटीक बैठता है कि, हिना की तो किस्मत ही है पिसकर भी खुशबू बिखेरना।


अगर वाकई में महिला दिवस के मायनों को साकार करना है तो ज़रूरत है उन्हें सम्मान देने की... और ये मेरे या किसी और के कहने से नहीं बल्कि दिया जाना चाहिए अपने दिल से... क्योंकि सख्ती लागू करने पर तो जंगल का राजा शेर भी इंसान के इशारों पर करतब दिखाना शुरु कर देता है... अंत में सिर्फ एक ही बात कहनी है जो मशहूर शायर असरार- उल- हक़ मजाज़ का है... कि,
तेरे माथे पर तो ये आंचल खूब है लेकिन,
तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था...
 

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