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सीबीआई में आधी रात का तख्तापलट

Thursday, October 25, 2018 08:20 AM

सीबीआई के जारी दंगल में अब तक पार्टी के तौर पर नजर आ रहा पीएमओ अचानक किरदार बदल कर रेफरी की भूमिका में आ गया है। खबर है कि मंगलवार को देर शाम से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और मुल्क के सबसे ताकतवर माने जाने वाले नौकरशाह और प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल मंत्रणा करने बैठ गए थे। और देर रात तक सीबीआई में सत्ता परिवर्तन के तौर पर नतीजा सामने आया। रात दो बजे सरकार ने आलोक वर्मा से सीबीआई निदेशक पद का चार्ज छीनने का फैसला किया। फैसले के तहत सरकार ने सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया गया है।

केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने बयान जारी कर बताया कि फिलहाल आलोक वर्मा की जगह एम. नागेश्वर राव को सीबीआई के अंतरिम निदेशक का कार्यभार सौंपा गया है। एम. नागेश्वर राव वर्तमान में सीबीआई में बतौर संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत हैं। ओडिशा कैडर के 1986 बैच के आईपीएस एम. नागेश्वर राव तेलंगाना के रहने वाले हैं। अस्थाना के खिलाफ  जांच कर रहे अधिकारियों को काले पानी की सजा दी गई है। बहरहाल, इस तरह से साख खोती सीबीआई एक बार फिर से बेसिर की संस्था हो गई है। हालांकि जानकारों का कहना है कि सरकार ने अपने अख्तियार से बाहर जाकर यह फैसला लिया है।

जानकार मानते हैं कि यह सरकार की ओर से की गई एक ऐसी कार्रवाई है जिसे शायद ही कानूनी समर्थन हासिल हो। सीबीआई की रुल बुक के मुताबिक उसका अफसर सर्वशक्तिमान होता है। जब तक वह कुर्सी पर बैठा है सरकार, नेता और अफसरशाही उसका कुछ ज्यादा नहीं बिगाड़ सकती। और दो साल तक उसे उसकी कुर्सी से हटाया नहीं जा सकता। इस दौरान पूरी सीबीआई अपने डायरेक्टर को रिपोर्ट करती है और उसका आदेश सर्वोपरि माना जाता है। यही वजह है कि रंजीत सिन्हा जैसे डायरेक्टर भी अपना कार्यकाल पूरा कर पाते हैं।

जानकारों की माने तो सीबीआई के निदेशक के तौर पर नियुक्त आलोक वर्मा कोलेजियम से संरक्षित हैं और उनने घूस और उगाही के मामले में अपने जूनियर के खिलाफ  कानून के तहत कार्रवाई की है। बहरहाल, आलोक वर्मा ने सरकार के फैसले के खिलाफ  सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को उनकी याचिका पर सुनवाई करेगी। अब सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि कानूनी दायरे से बाहर जाकर भी सरकार आलोक वर्मा को उनके पद से हटाना चाहती है। फौरी तौर पर जो नजर आता है वह यह कि उनने प्रधानमंत्री के करीबी माने जाने वाले अधिकारी अस्थाना के खिलाफ  भ्रष्टाचार का मामला चलाया और उन्हें गिरफ्तार करने का अनुरोध किया।

संयुक्त सचिव से ऊपर के अधिकारी की गिरफ्तारी के लिए सरकार से इजाजत लेने का प्रावधान है। प्रावधान के तहत वर्मा ने अस्थाना की गिरफ्तारी की अपील की थी, जिसे सरकार की ओर से खारिज कर दिया गया था। पद संभालने के बाद से जिस कदर अस्थाना के सवाल पर आलोक वर्मा ने अपनी ताकत का अहसास सरकार को कराया है वह उसे रास नहीं आया है। जब एडिशनल डायरेक्टर राकेश अस्थाना को मोदी सरकार स्पेशल डायरेक्टर बनाना चाहती थी तो वर्मा ने इस पर अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया।

हालांकि इसके बाद भी अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर बना दिया गया। वर्मा और अस्थाना की अदावत के गवाह रहे अफसर बताते हैं कि दोनों अफसर जब भी आमने-सामने होते थे उनके बीच की खींचतान साफ  दिखती थी। निदेशक के तौर पर वर्मा विपक्ष के नेताओं के खिलाफ  सियासी मकसद से की गई हर गैर संवैधानिक कार्रवाई को रोकने पर जोर देते थे। जबकि सूत्रों की मानी जाए तो दूसरी ओर विशेष निदेशक अस्थाना सियासी एजेंडे को जारी रखने में दिलचस्पी रखते हैं। लालू यादव के परिवार के खिलाफ  की गई कार्रवाई उसका ताजा उदाहरण है। बताया जाता है कि जब निदेशक के तौर पर वर्मा ने उसका विरोध किया तो अस्थाना ने इसको मुद्दा बना दिया और उनकी सीवीसी से शिकायत कर दी।

सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि अस्थाना ने विजय माल्या के मामले को भी कमजोर कर दिया है। पर असल में यह केवल दो आला अधिकारियों के बीच के खींचतान भर का मामला नहीं है। राफेल मामले में भी आलोक वर्मा की सक्रियता सरकार को रास नहीं आ रही थी। बताया जाता है कि उनने विवादित राफेल डील के दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी। पिछले दिनों भाजपा के दो वरिष्ठ नेता यशवंत सिंहा और अरुण शौरी ने भी आलोक वर्मा से मुलाकात कर राफेल मामले की आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी और मामले में जांच की मांग सीबीआई से की थी। भाजपा के इन दो असंतुष्ट नेताओं से वर्मा का यों मिलना भी मोदी सरकार को रास नहीं आया था।

यानी वर्मा सरकार की राह में रोड़ा बन रहे थे। लिहाजा, आलोक वर्मा को उन्हें निदेशक के पद हटाने का सरकार का फैसला फौरी तौर पर तो विवाद हल करने के लिए पंच परमेश्वर की ओर से उठाया गया बराबरी का कदम लगता है। पर ऐसा है नहीं। मुमकिन है राफेल मामले में सक्रियता का उन्हें खामियाजा उठाना पड़ा है। चूंकि उनकी नियुक्ति कोलेजियम से संरक्षित है लिहाजा, उनके लिए अदालत का दरवाजा खुला है। अब देखना है अदालत क्या फैसला लेती है। फिलहाल मुल्क तो अपनी आला जांच एजेंसी का विघटीकरण और चूर्नीकरण बड़े गौर से देख रहा है।

-शिवेश गर्ग

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