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एक गंगापुत्र की मौत

Saturday, October 13, 2018 08:15 AM

पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल

यह महज संयोग की ही बात हो सकती है कि भू-गर्भ जल विज्ञान के जानकार और पर्यावरणविद् जीडी अग्रवाल, जो संन्यास लेने के बाद स्वामी ज्ञानस्वरुप सानंद हो गए थे। बुधवार को गंगा के सवाल पर जारी उनका अनशन जब जबरन तोड़ा जा रहा था और वे जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे, उसी दिन दिल्ली में केन्द्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती गंगा और यमुना की सफाई से जुड़े एक सवाल पर फरमा रही थी कि गंगा और यमुना की सफाई का मिशन पूरा होने के बाद देश-दुनिया की अन्य नदियां भी ‘मी टू’ का आह्वान करेंगी यानी मेरे लिए भी आंदोलन शुरू करो।

संयोग देखिए जीडी अग्रवाल की तरह ही साध्वी उमा भारती संन्यासी हैं और गंगा को लेकर अपनी भावुकता जगजाहिर करने का शायद ही कोई मौका वे छोड़ती होंगी। पर एक संन्यासी ने गंगा की दुर्दशा के सवाल पर आंदोलन करते हुए अपनी जान गंवा दी और दूसरी साध्वी ने मंत्री बनकर गंगा और मुल्क की बाकी नदियों को इतना तुच्छ बना डाला कि उन्हें अपना अस्तित्व बचाने के लिए साध्वी मंत्री की सरकार से मी टू की गुहार लगानी पड़ेगी।

साध्वी जब यह उद्गार व्यक्त कर रही थी, तो नमामी गंगे योजना के मौजूदा कर्ताधर्ता केन्द्रीय मंत्री नीतिन गडकरी भी वहां मौजूद थे। प्रोफेसर अग्रवाल के करीबी मानते हैं कि उनकी मौत कुदरती नहीं है बल्कि विशुद्ध हत्या है। और इसके लिए केन्द्र की मोदी सरकार, स्थानीय पुलिस और प्रशासन जिम्मेदार है। असल में, यह साध्वी और उनकी सरकार का कसूर नहीं है। गंगा को लेकर उनकी समझ का कसूर है। वे जिस सरकार में मंत्री हैं उस सरकार के मुखिया और यानी मुल्क के प्रधानमंत्री भी पिछले चुनाव में गंगा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता सार्वजनिक कर चुके हैं।

उनने बनारस से चुनाव लड़ने की वजह बताते हुए कहा था कि वे आए नहीं हैं, बुलाए गए हैं। उन्हें मां गंगा ने बुलाया है। वे वाराणसी से चुनाव जीत कर मुल्क के प्रधानमंत्री भी बन गए और बतौर गंगापुत्र अपनी प्रतिबद्धता साबित करते हुए उनने नमामी गंगे नाम की योजना का उद्घोष भी किया, जिस योजना की देखरेख का जिम्मा पहले साध्वी उमा भारती को सौंपा गया था, मगर बाद में योजना की लचर हालत के मद्देनजर मोदी सरकार के सबसे योग्य माने जाने वाले मंत्री नीतिन गडकरी को इसका जिम्मा सौंपा गया।

पर आज यह योजना अपने चौथे साल में प्रवेश कर चुकी है और मां गंगा की दुर्दशा ज्यों की त्यों बरकरार है। इन चार सालों में गंगा की दुर्दशा के बरक्स प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की ओर से लिखे गए तीन अदद खतों का जवाब देना भी स्वयं-भू गंगापुत्र ने जरूरी नहीं समझा है। प्रोफेसर अग्रवाल ने इन सालों में तीन खत पीएम को लिखे थे। उनने अपना 111 दिनों का अनशन शुरू करने के दूसरे ही दिन 23 जून को तीसरा खत प्रधानमंत्री को लिखा था। इससे पहले वे इसी साल 24 फरवरी और 13 जून को दो और पत्र प्रधानमंत्री को लिख चुके थे। पर पीएम की ओर से किसी का भी जवाब उन्हें नहीं मिला।

और विडंबना देखिए कि जब 2012 में गंगा के सवाल पर ही प्रोफेसर अग्रवाल ने अपना अनशन शुरू किया था तब बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सौलिडरिटी के तौर पर ट्वीट कर उनकी मांगों समर्थन किया था और तब की मनमोहन सिंह सरकार से उनकी मांगों पर गौर करने की अपील भी की थी। पर आज जब वे खुद मुल्क के प्रधानमंत्री हैं तो प्रोफेसर अग्रवाल की मांगों पर गौर करने का उनके पास कोई समय नहीं था। यहां तक कि उनके खतों का जवाब देने के सहज अदब निभाना भी उनने मुनासिब नहीं समझा।

यह बात और है कि उनकी मौत पर श्रद्धांजलि देकर उनने रस्मअदायगी जरूर पूरी कर ली है। अपने खतों में प्रोफेसर अग्रवाल लगातार सरकार को अपनी बात समझाने की कोशिश करते रहे हैं। उनका मानना था कि गंगा सहित मुल्क की तमाम नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए उनका पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखना जरूरी है। और इससे लिए जरूरी है कि तमाम हाईड्रो इलेक्ट्रिक परियोजनाओं पर रोक लगाई जाए। गंगा किनारे बालू खनन पर पूरी तरह से वे प्रतिबंध चाहते थे। साथ ही नदियों के किनारे किए गए अतिक्रमण को हटाने के लिए असरदार कानून बनाए जाने की जरूरत और गंगा की सफाई पर निगरानी के लिए एक काउसिंल को गठन भी उनकी मांगों में शामिल था।

यहां एक सवाल अहम है कि जिस गंगा की सफाई की मांग प्रोफेसर अग्रवाल कर रहे थे उसके लिए मोदी सरकार ने बाकायदा अलग से एक मंत्रालय बना रखा है, तो उन्हें 111 दिन के अनशन के बाद आखिरकार अपनी जान क्यों गवानी पड़ी है। कहने की दरकार नहीं कि पिछले चार सालों में मंत्रालय ने कुछ भी नहीं किया है। इस बीच, हुआ यह है कि मंत्रालय का पहले कार्यभार संभाल रही साध्वी मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दिया है।

मंत्रालय आवंटित बजट का एक तिहाई हिस्सा भी खर्च नहीं कर पाई। नमामी गंगे के नाम पर गंगा के कुछ घाटों पर बिजली के खंभे और लाईट जरूरी लगी है। पर गंगा की दुर्दशा बरकरार है। साध्वी के शब्दों में कहें तो अपने स्व-घोषित पुत्र की सरकार से मी टू भी कहने की हालत में नहीं है। उन्हें अभी भी इसका इंतजार है। इस बीच न जाने अभी प्रोफेसर अग्रवाल जैसे कितने ही गंगापुत्रों को मां की रक्षा के लिए जान गंवानी पड़े।        
-शिवेश गर्ग

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